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    संसद में मोदी सरकार ने रचा नया इतिहास

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यApril 18, 2026No Comments5 Mins Read
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    महिला आरक्षण और परिसीमन की नई इबारत लिखने को तैयार सरकार, 2029 के चुनावों में दिखेगी नई लोकसभा?
    उत्तराखण्ड सत्य,नई दिल्ली

    भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पिछले तीन दिन अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। संसद के विशेष सत्र में जिस तरह से महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन और नए परिसीमन की रूपरेखा पर मंथन हुआ है, उसने देश की भावी राजनीति की दिशा तय कर दी है। वर्ष 1996 से लटका पड़ा यह मुद्दा, जिसने कभी संसद को अगड़े-पिछड़े और ऊंचे-नीचे के खांचों में बांटकर जख्म दिए थे, अब एक बार फिर केंद्र में है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि 2029 के आम चुनावों तक महिला आरक्षण को धरातल पर उतारना उसकी सर्वाेच्च प्राथमिकता है, लेकिन इस राह में संवैधानिक बाधाओं का पहाड़ खड़ा है। 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार के दौरान जिस महिला आरक्षण बिल को फाड़कर फेंक दिया गया था, उसकी यादें आज भी उन गलियारों में ताजा हैं जहां कभी मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू प्रसाद जैसे दिग्गजों ने श्बालकटीश् और श्फैशनपरस्तश् महिलाओं के संसद पहुंचने का तर्क देकर इसका विरोध किया था। हालांकि, सितंबर 2023 में श्नारी शक्ति वंदन विधेयकश् के पारित होने के बाद स्थितियां बदलीं, लेकिन इसके लागू न होने से एक रिक्तता बनी हुई थी। अब सरकार इसे 131वें संविधान संशोधन के जरिए नई ऊर्जा देना चाहती है। विशेष सत्र की चर्चाओं में सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि क्या 2029 में देश एक ऐसी लोकसभा देखेगा जहां महिलाओं की भागीदारी का वादा हकीकत होगा। संसद के भीतर चल रही इस कवायद में सबसे बड़ी बाधा आंकड़ों का गणित है। संविधान संशोधन के लिए सरकार को सदन में दो-तिहाई बहुमत यानी 362 सांसदों के समर्थन की दरकार है। वर्तमान में विपक्ष के खेमे में 233 सांसद हैं, जो किसी भी बड़े बदलाव को रोकने या उसे चुनौती देने की स्थिति में हैं। विपक्षी दलों का तर्क है कि चुनाव से ठीक पहले और राज्यों में मतदान के बीच इस तरह के संवेदनशील मुद्दे को लाना राजनीति से प्रेरित है। वे परिसीमन कानून के विरोध में मत-विभाजन की मांग कर रहे हैं, जिससे सरकार के लिए अग्निपरीक्षा की स्थिति पैदा हो गई है। सरकार की मंशा साफ है कि 2026 तक की फ्ीज अवधि के बाद अब वह परिसीमन आयोग का गठन कर भविष्य की तस्वीर साफ करे। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे का तार्किक आधार जनसंख्या में हुआ व्यापक परिवर्तन है। 1971 की जनगणना के आधार पर चल रही हमारी वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों की संख्या अब अप्रासंगिक हो चुकी है। अर्थव्यवस्था और जनसंख्या के बदलते स्वरूप को देखते हुए अब यह बदलाव अनिवार्य हो गया है। जानकारों का मानना है कि यदि यह बिल पारित होता है, तो 2029 तक देश की लोकसभा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और सदन में 850 सदस्यों की उपस्थिति दिखाई देगी, जिनमें राज्यों से 815 और संघशासित प्रदेशों से 35 सांसद चुनकर आएंगे। इस बीच, कुछ विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि 2027 की जनगणना के बाद एक और परिसीमन की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे 2029 तक इसका क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, राजनीति इस देश की हर धड़कन में बसी है और संसद का यह विशेष सत्र इसी धड़कन की एक बानगी है। यह केवल कानून बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश के सामाजिक, लैंगिक और संसदीय ढांचे को हमेशा के लिए बदल देने वाला एक ऐतिहासिक कदम है। आने वाले दिन बताएंगे कि क्या सरकार 362 के जादुई आंकड़े को छू पाएगी या फिर महिला आरक्षण का यह सपना एक बार फिर लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की भेंट चढ़ जाएगा।

    संसद का नया स्वरूप और महिला आरक्षण की राह
    इस विशेष सत्र के दौरान जो प्रस्ताव पटल पर रखा गया है, वह भारतीय संसदीय इतिहास में एक बड़े बदलाव का आधार है। यदि महिला आरक्षण कानून और परिसीमन का नया खाका पूरी तरह लागू होता है, तो 2029 तक भारत की संसद का चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा। वर्तमान में जहां लोकसभा में 543 सदस्य हैं, वहीं प्रस्तावित बदलावों के बाद यह संख्या बढ़कर 850 हो जाएगी, जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व 815 और संघशासित क्षेत्रें का 35 होगा।सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आरक्षण केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर 15 साल की अवधि के लिए लागू किया जाएगा। हालांकि, सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती संविधान संशोधन की है। चूंकि महिला आरक्षण एक संवैधानिक विषय है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित सांसदों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह है कि सरकार को कुल 362 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा, जबकि विपक्ष के पास 233 सांसदों की मजबूत ताकत है। यदि परिसीमन और महिला आरक्षण के इस श्पैकेजश् पर विपक्ष और सरकार के बीच आम सहमति नहीं बनती है, तो देश को एक लंबी राजनीतिक और संवैधानिक रस्साकशी का गवाह बनना पड़ सकता है। सरकार की रणनीति 2029 के चुनावों से पहले इस कानून को लागू करने की है, लेकिन समय की कमी और परिसीमन की जटिलताएं इस लक्ष्य को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

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