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    Home » देवभूमि में ‘मदरसा युग’ का अंत, राष्ट्रवादी शिक्षा की नई इबारत
    उत्तराखंड

    देवभूमि में ‘मदरसा युग’ का अंत, राष्ट्रवादी शिक्षा की नई इबारत

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यFebruary 7, 2026No Comments5 Mins Read
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    दशकों से चली आ रही मदरसा बोर्ड की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी

    अजय चड्डा,देहरादून
    देहरादून। उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने अपने साहसिक निर्णयों की श्रृंखला में एक और बड़ा अध्याय जोड़ दिया है। ट्रिपल तलाक के खिलाफ कड़े रुख और समान नागरिक संहिता को जमीन पर उतारने के बाद, अब राज्य में दशकों से चली आ रही मदरसा बोर्ड की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी कर ली गई है। आगामी जुलाई माह से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड इतिहास का हिस्सा बन जाएगा और राज्य के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के एक साझा मंच के नीचे कार्य करेंगे। यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि देवभूमि की शिक्षा व्यवस्था को ‘कबीलाई’ और ‘मजहबी’ चंगुल से निकालकर आधुनिक और राष्ट्रवादी सांचे में ढालने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।धामी सरकार के इस निर्णय की जड़ें उन विसंगतियों में छिपी हैं, जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में शासन की नींद उड़ा दी थी। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि प्रदेश में सैकड़ों मदरसे बिना किसी सरकारी अनुमति के संचालित हो रहे थे, जहाँ न केवल बाहरी राज्यों के बच्चों को लाकर पढ़ाया जा रहा था, बल्कि हरिद्वार जैसे जनपदों में हिंदू बच्चों को भी मजहबी शिक्षा दिए जाने के गंभीर मामले उजागर हुए। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के हस्तक्षेप और शासन की सख्ती के बाद जब फंडिंग और संचालकों के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हुई, तो परतें खुलती चली गईं। परिणामस्वरूप, सरकार ने पहले 227 अवैध मदरसों पर ताला जड़ा और फिर इस पूरी व्यवस्था के कायाकल्प का मन बनाया। अब राज्य में ‘मदरसा’ नाम की कोई भी संस्था स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रहेगीऋ सभी को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मुख्यधारा का पाठयक्रम ही पढ़ाना होगा।इस नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने 12 सदस्यीय विशेषज्ञों की एक उच्चाधिकार प्राप्त टीम की घोषणा भी कर दी है। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी की अध्यक्षता में गठित इस प्राधिकरण में समाज के हर अल्पसंख्यक वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इनमें डॉ. सैयद अली हमीद, प्रोफेसर रोबिना अमन, डॉ. राकेश जैन, डॉ. एल्बा, पेमा तेनजिन और डॉ. गुरमीत सिंह जैसे शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। अल्पसंख्यक विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार, यह प्राधिकरण तय करेगा कि यदि बच्चों को उनके धर्म की शिक्षा देनी भी है, तो उसका स्वरूप क्या होगा, ताकि वह आधुनिकता के आड़े न आए। शेष पाठड्ढक्रम पूरी तरह राज्य शिक्षा बोर्ड के अनुरूप होगा, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को सरकारी सहायता और वजीफे का लाभ भी पारदर्शिता के साथ मिल सकेगा।दिलचस्प बात यह है कि सरकार के इस फैसले का स्वागत स्वयं अल्पसंख्यक समाज के प्रबुद्ध नेतृत्व ने किया है। मदरसा बोर्ड के निवर्तमान अध्यक्ष शमूम कासमी और वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स इसे एक ऐतिहासिक मोड़ मान रहे हैं। उनका मानना है कि मजहबी शिक्षा के केंद्र अब नए जमाने के शिक्षण संस्थानों में तब्दील होंगे, जिससे मुस्लिम समाज के बच्चे भी दुनिया की प्रगति के साथ कदम से कदम मिला सकेंगे। अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष फरजाना बेगम ने भी इसे बेहतर भविष्य और रोजगार के अवसरों का द्वार बताया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट मत है कि अब तक यह धुंधलका बना हुआ था कि इन संस्थानों में कौन पढ़ा रहा है और फंडिंग कहाँ से आ रही है। अब ‘समान अवसर’ के सिद्धांत के तहत न केवल मुस्लिम, बल्कि जैन, सिख, ईसाई और पारसी समुदायों के बच्चों को भी बराबरी के साथ मुख्यधारा की शिक्षा और सुविधाएं मिलेंगी। देवभूमि का यह ‘उत्तराखंड मॉडल’ आने वाले समय में देश के लिए एक नई नजीर पेश करने जा रहा है।

    जाँच की तपिश और सुधार की छटपटाहट
    मदरसा बोर्ड को भंग करने का सरकार का निर्णय रातों-रात लिया गया कोई प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन जाँच और व्यवस्थागत विसंगतियों की एक लंबी कड़वी सच्चाई छिपी है। खुफिया एजेंसियों और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की रिपोर्टों ने समय-समय पर शासन को सचेत किया कि देवभूमि की शांत वादियों में चल रहे कई शिक्षण केंद्र अपनी मूल राह से भटक चुके हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य उन संदिग्ध वित्तीय स्रोतों का था, जिनका कोई पारदर्शी हिसाब-किताब नहीं मिल सका। कई स्थानों पर तो मजहबी शिक्षा का दायरा इतना बढ़ गया कि वहां पढ़ रहे गैर-मुस्लिम बच्चों के भविष्य पर भी सवाल खड़े होने लगे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस ‘अदृश्य तंत्र’ को मुख्यधारा में लाने के लिए एक कड़ा लेकिन आवश्यक रास्ता चुना। 227 अवैध मदरसों पर तालाबंदी केवल एक कार्रवाई नहीं, बल्कि इस बात का संकेत थी कि अब शिक्षा के नाम पर ‘कबीलाई व्यवस्था’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब बदली हुई परिस्थितियों में, जब ये संस्थान अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की छत्रछाया में आएंगे, तो प्रतिस्पर्धा केवल धर्म के आधार पर नहीं बल्कि ज्ञान के आधार पर होगी। यह इनसेट इस बात की तस्दीक करता है कि आगामी जुलाई से अल्पसंख्यक छात्र केवल आयतें या प्रार्थनाएं नहीं सीखेंगे, बल्कि वे विज्ञान और तकनीक की उस भाषा को भी आत्मसात करेंगे, जो उन्हें देश की सीमाओं से बाहर वैश्विक मंचों पर सम्मान दिला सके।

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