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    Home » रीलो में उलझती जिंदगी…..
    उत्तराखंड

    रीलो में उलझती जिंदगी…..

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यSeptember 28, 2025No Comments4 Mins Read
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    • डॉ रचना अरोरा,रुद्रपुर 

    19वीं सदी में काले रंग की रीलों के रोल.कमरे में पिक्चर हॉल में.प्रोजेक्टर मे मोटे-मोटे रोल. कैमरा में छोटे आकार में थोड़े पतले रीलों के रोल फोटो के रूप में बाद में धुल कर हमारी रंग बिरंगी एल्बम मे हमारी मधुर स्मृतियां बन सहज संजोये जाते थे. और जो बहुत बड़े से पर्दे पर पूरे चलचित्र यानी पिक्चर हॉल मैं प्रदर्शित हो कर बड़ी शान से मनोरंजन का नंबर वन हिस्सा बन जाते थे जिसका सारा जिम्मा उन सैकड़ो हजारों पिक्चर्स का समूह काले रंग की रीलों पर ही टिका होता था जो बड़े शान से लोहे के बक्सों में इतराती हुई एक शहर से दूसरे शहर. गांव- कस्बा में सफर करती थी रीले थी तो काली लेकिन सैकड़ो लाखों लोगों की दुनिया में रंग भर देती थी धीरे-धीरे कब ना जाने यह काली रिले कहां लुप्त होती चली गई क्योंकि दुनिया अब साइबर युग में प्रवेश कर रही थी हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल यानी चलता फिरता मनोरंजन का यंत्र वह भी प्रत्येक का व्यक्तिगत बेहद निजी जो व्यक्ति को बहुत सारी सुविधाएं देकर आज उनकी जरूरत बन गया है. सोशल मीडिया की सवसे लोकप्रिय साईट(फेसबुक -इंस्टाग्राम) मे एक अति लुभावना फीचर रील यानि सूक्ष्म चलचित्र जुड़ गया जहां हर व्यक्ति अपनी स्वयं की चित्रों की श्रृंखला. वीडियोअपने मन मुताबिक अपलोड कर सकता है और अब काली रीलों की जगह ये मोबाइल की रीलें.लोगो के मनोरंजन के साथ-साथ नंबर वन.लोकप्रियता हासील करने लगी.अभिव्यक्ति के लोकतंत्रीकरण के रूप में रील ने समान व्यक्ति को अपनी कला विचारों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर दिया है विज्ञान.भाषा तकनीकी. कैरियर मार्गदर्शन आदि विषयों पर रोचक एवं संक्षिप्त प्रभावी ज्ञानवर्धक वीडियो छात्रों युवाओं के लिए उपयुक्त सिद्ध हो रहे हैं अनेक कंटेंट क्रिएटर रील के माध्यम से प्रसिद्धि प्राप्त कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं. डिजिटल मार्केटिंग और विज्ञापन उद्योग में भी रील ने नई संभावनाएं खुली है.

    सरकारी और गैर सरकारी निज़ी संगठन सामाजिक अभिव्यक्ति एवं जागरूकता के लिए रील्स का प्रभावी उपयोग कर रहे हैं रील्स का यह सकारात्मक पहलू चारों तरफ सूचना प्रधान समाज को त्वरित सूचना प्रधान समाज में परिवर्तित कर दिया है संचार की गति और पहुंच अभूतपूर्व हुई है अब आप तेजी से लोकप्रिय होती इन रील या लघु चलचित्रों .की नकारात्मक पहलू की तरफ नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि यह लगातार रील देखने की लत समय की बर्बादी और युवाओं ही नहीं वरन एक साधारण से व्यक्ति को कर्म क्षेत्र से विमुख करने लगी हैं त्वरित प्रसिद्धि. लालसा अवसाद.चिंता आत्म मूल्यांकन में कमी.ध्यान भंग. है जिससे उत्पादकता प्रभावित होती है

    अश्लीलता हिंसात्मक या झूठी अधूरी जानकारी समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगी है और अब यह ए- आई यानी कृत्रिम मेधा का प्रवेश ने डिजिटल दुनिया आभासी दुनिया में एक क्रांति या फिर ष्आग में घी ष्की तरह काम किया है सत्य और असत्य में या आभास में भेद करना बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा है. तो अब इस ए का उपयोग या दुरुपयोग किसी भी क्षेत्र /व्यक्तित्व को कुछ ही क्षणो में उत्थान या पतन की छवि के साथ प्रस्तुत कर सकता है यह साथ ही गहन चिंतन.धैर्यशीलता का हृास भी परिलीक्षित होता है. यह प्रवृत्ति सामाजिक मूल्य सांस्कृतिक. धार्मिक अभिव्यक्ति और नैतिकता पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल रही है यानी वायरल होने की होड़. दिखावा का प्रचलन बढ़ता जा रहा है सुबह अखबार खोलते ही खबर पडी रील बनाने के चक्कर में एक महिला की कार खाई में गिरने से मौत. नदी किनारे रील बनाते हुए दो युवकों की फिसल कर नदी में डूबने से मौत..यह कोई एक चॉकाने वाली खबर नहीं है. क्योंकि आए दिन खबर सुनाइ या फिर दिखाई पड़ती है कभी किसी वाहन में. कभी किसी पहाड़ पर. कभी खाई पर. कभी जमीन पर. कई फीट ऊपर आसमान में. कभी कई फुट नीचे पाताल में. आत्म प्रदर्शन करती इन लघु चलचित्रो (रीलो) मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोज मर्रा की जिंदगी या दिनचर्या उलझती जा रही है यहां तक की रिश्तों पर भी रीलों का असर पड़ने लगा है..

    रिले मनोरंजन जागरूकता भरी यानी सकारात्मक भरी तो ठीक है परंतु अब हर हद पार करती रिश्तों. संस्कृति संस्कारों धर्म परंपराओं का मजाक उड़ाती मनोरंजन की थाली में फुहड़ता परोसती भद्दा मज़ाक द्वीअर्थी चुटकले. दर्शाती ये रिले कभी कभी जिन्दगी मे भारी पडती जा रही हैँ……… रील या शार्ट वीडियो आधुनिक युग की द्वीधारी तलवार की तरह है एक और यह रचनात्मक अभिव्यक्ति और आर्थिक सशक्तिकरण का साधन है वहीं दूसरी और यह समय अव्यय और सामाजिक संस्कृत पतन का कारण बन सकती है. अतः अति आवश्यक है उनके उपयोग में संयम विवेक एक उत्तरदायित्व अपनाया जाए तभी या तकनीकी साधन समाज में वरदान कारगर सिद्ध हो होगा . जिंदगी यो को रीलों में उलझाया ना जाए व वरन इनके संतुलित सदुपयोग. रचनात्मकता से जीवन को सुलझाया सवरा जाए……..

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