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    Home » रुद्रपुर सड़क हादसा और कथित मारपीट प्रकरण, जांच में नहीं मिला मारपीट का साक्ष्य
    ऊधम सिंह नगर

    रुद्रपुर सड़क हादसा और कथित मारपीट प्रकरण, जांच में नहीं मिला मारपीट का साक्ष्य

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यAugust 23, 2026No Comments6 Mins Read
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    सीसीटीवी, गवाहों और बयानों की पड़ताल के बाद पुलिस ने पारस चुघ की भूमिका विवेचना से हटाई
    हाईकोर्ट में सरकार ने भी रखी जांच की स्थिति

    रुद्रपुर। जिस मामले ने 7 अगस्त की रात सड़क हादसे के बाद रुद्रपुर में राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी थी, उसकी जांच आगे बढ़ने के साथ कहानी का एक अहम पहलू सामने आया है। सड़क दुर्घटना के बाद पारस चुघ और अन्य लोगों पर लगाए गए मारपीट के आरोपों की पुलिस जांच में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे पारस चुघ की कथित मारपीट में संलिप्तता स्थापित हो सके। सीसीटीवी फुटेज, स्वतंत्र गवाहों, घायलों और शिकायतकर्ता के बयानों की पड़ताल के बाद पुलिस ने उनकी भूमिका विवेचना से समाप्त कर दी है। राज्य सरकार की ओर से यह स्थिति हाईकोर्ट के समक्ष भी रखी गई है।
    मामले की शुरुआत 7 अगस्त की रात काशीपुर रोड क्षेत्र में स्कूटी और स्कॉर्पियो की टक्कर से हुई। हादसे में अभिषेक और उसका साथी घायल हुए। अगले दिन 8 अगस्त को कोतवाली रुद्रपुर में एफआईआर संख्या 0413/2026 दर्ज हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि हादसे के बाद पारस चुघ 10-12 युवकों के साथ मौके पर पहुंचे और घायलों के साथ मारपीट की।
    आरोपों को गलत बताते हुए पारस चुघ ने हाईकोर्ट का रुख किया। एफआईआर निरस्त करने और गिरफ्तारी से संरक्षण की मांग की गई। 14 अगस्त को सुनवाई के दौरान उनकी ओर से घटनास्थल का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध होने की बात रखी गई। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को विवेचक से जानकारी लेने तथा सीसीटीवी फुटेज अगली सुनवाई में पेश करने के निर्देश दिए।
    इसके बाद जांच का फोकस आरोपों के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों पर गया। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के साथ स्वतंत्र गवाहों, घायलों और शिकायतकर्ता अंकित के बयानों का परीक्षण किया। शिकायतकर्ता के बयान में यह बात सामने आई कि पारस चुघ के घटनास्थल पर पहुंचने तक दोनों घायल अस्पताल के लिए जा चुके थे। इस स्थिति में पारस चुघ और घायलों की एक साथ मौजूदगी स्थापित नहीं हो सकी।
    यही बिंदु मामले की जांच में महत्वपूर्ण साबित हुआ। पुलिस को कथित मारपीट की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं मिला। पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पारस चुघ तथा उनके साथ बताए गए 10-12 युवकों के िखलाफ अपराध में संलिप्तता का कोई साक्ष्य सामने नहीं आया है। इसके बाद पारस चुघ की भूमिका विवेचना से हटा दी गई।
    मामले ने हालांकि इससे पहले राजनीितक और सामाजिक स्तर पर काफी असर डाला था। पारस चुघ की गिरफ्तारी की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन हुए और घटना को लेकर वाल्मीकि समाज में आक्रोश भी सामने आया। आरोपों के आधार पर हुई शुरुआती कार्रवाई ने पूरे प्रकरण को सड़क हादसे से कहीं आगे राजनीतिक विवाद में बदल दिया।
    अब जांच की दिशा बदलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि शुरुआती आरोपों और बाद की जांच के निष्कर्षों के बीच जो अंतर सामने आया, उसका जिम्मेदार कौन है? क्या सोशल और सार्वजनिक दबाव के बीच पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक फैसले जल्दबाजी में हुए? और यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई तो शुरुआती स्तर पर लिए गए फैसलों की जवाबदेही तय होगी या नहीं?
    पारस चुघ की ओर से हाईकोर्ट में अधिवक्ता विपुल शर्मा, ललित शर्मा और अनमोल संधू ने पैरवी की। फिलहाल पुलिस जांच में मारपीट के आरोपों का साक्ष्य नहीं मिलने और विवेचना से भूमिका हटाए जाने को पारस चुघ के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    सवाल सिर्फ पारस चुघ का नहीं, पार्टी के रवैये का भी
    आरोप लगा तो पार्टी ने छोड़ा, अब साक्ष्य नहीं मिला तो क्या भाजपा जोड़ेगी?
    रूद्रपुर। पारस चुघ प्रकरण में अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि सड़क हादसे के बाद मारपीट हुई थी या नहीं। बड़ा सवाल यह भी है कि भाजपा ने अपने ही मंडल महामंत्री के िखलाफ कार्रवाई करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई?
    7 अगस्त की रात पारस चुघ की कार से सड़क दुर्घटना हुई। इसके बाद पीड़ित पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों से वाल्मीकि समाज में आक्रोश पैदा हुआ। आक्रोश बढ़ा तो पुलिस ने तहरीर के आधार पर पारस चुघ, उनके भाई समेत अन्य लोगों के िखलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया। इसके बाद भाजपा ने भी कार्रवाई करते हुए पारस चुघ को तत्काल पद और पार्टी से निष्कासित कर दिया।
    सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या पार्टी ने आरोपों की पुष्टि होने का इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा? घटना के बाद सामने आए वीडियो और पुलिस की शुरुआती पड़ताल में मामला सड़क दुर्घटना से जुड़ा होने की बात सामने आ चुकी थी। इसके बावजूद पार्टी ने अपने कार्यकर्ता के मामले में कोई लंबी प्रक्रिया अपनाने के बजाय तत्काल निष्कासन का रास्ता चुना। भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित पार्टी बताती है। कार्यकर्ता को संगठन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में सामान्य राजनीतिक सवाल यह उठता है कि जब किसी कार्यकर्ता पर आरोप लगे तो क्या सिर्फ आरोप के आधार पर उसे संगठन से बाहर कर देना ही कार्यकर्ता के प्रति पार्टी की नीति है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि राजनीति में आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगने के मामलों में भी पार्टियां अक्सर जांच, राजनीतिक दबाव और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाती दिखाई देती हैं। कई मामलों में कार्रवाई इस्तीफे या पद से हटने तक सीमित रहती है, जबकि संगठनात्मक निष्कासन जैसी कठोर कार्रवाई तुरंत नहीं होती। ऐसे उदाहरणों को देखते हुए पारस चुघ प्रकरण में भाजपा की जल्दबाजी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब स्थिति बदल चुकी है। पुलिस जांच में पारस चुघ की कथित मारपीट में संलिप्तता का साक्ष्य नहीं मिला और उनकी भूमिका विवेचना से हटा दी गई। ऐसे में क्या पार्टी अपने फैसले की समीक्षा करेगी? क्या पारस चुघ को संगठन में वापस जगह मिलेगी? क्या उन्हें वही पद या कोई अन्य जिम्मेदारी दी जाएगी? या पार्टी अपने पुराने फैसले पर कायम रहेगी? इन सवालों के जवाब अब भाजपा के अगले कदम से मिलेंगे। फिलहाल इतना जरूर है कि जिस मामले में आरोपों के बाद राजनीतिक फैसला कुछ ही समय में हो गया था, उसी मामले की जांच ने अब एक अलग तस्वीर सामने रख दी है। ऐसे में यह प्रकरण सिर्फ एक कार्यकर्ता की राजनीतिक वापसी का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा आरोप और अपराध के बीच अंतर समझने तथा अपने कार्यकर्ताओं के प्रति न्यायपूर्ण प्रक्रिया अपनाने की कसौटी भी बन गया है।

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