वर्षों से अटके भुगतान को लेकर जिलेभर के राइस मिलर्स मुखर, आगामी धान खरीद सत्र से पहले सरकार पर बढ़ा दबाव
छह लाख क्विंटल चावल का उठान भी अटका, बढ़ते खर्च के बीच कस्टम मिलिंग चार्ज 80 रुपये करने की मांग, धान खरीद व्यवस्था पर भी पड़ सकता है असर
रुद्रपुर। तराई की अर्थव्यवस्था और सरकारी धान खरीद व्यवस्था की अहम कड़ी माने जाने वाले राइस मिलर्स का वर्षों से लंबित भुगतान अब बड़े मुद्दे का रूप लेने लगा है। वर्ष 2019 से 2025 तक करीब 500 करोड़ रुपये का भुगतान अटकने और बीते सत्र का करीब छह लाख क्विंटल चावल उठान के इंतजार में होने से जिलेभर के राइस मिलर्स मुखर हो गए हैं। बढ़ते बैंकिंग दायित्व, बिजली, मजदूरी और मिल संचालन के खर्च के बीच करोड़ों की पूंजी फंसने से नाराज मिलर्स अब सरकार से आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखाई दे रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि एसोसिएशन ने समस्याओं का समयबद्ध समाधान नहीं होने पर आगामी धान खरीद सत्र 2026-27 में सरकारी अनुबंध करने में असमर्थता जताकर सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
ऊधम सिंह नगर प्रदेश के प्रमुख धान उत्पादक जिलों में शामिल है और यहां सरकारी खरीद के बाद धान की कस्टम मिलिंग में राइस मिलों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में खरीद सत्र से ठीक पहले राइस मिलर्स की बढ़ती नाराजगी केवल कारोबारियों के भुगतान तक सीमित मामला नहीं रह गई है। मिलर्स अपने रुख पर कायम रहते हैं तो आने वाले खरीद सत्र की व्यवस्थाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है।
उत्तराखंड प्रदेश राइस मिलर्स एसोसिएशन के बैनर तले प्रदेश अध्यक्ष सत्यवान गर्ग के नेतृत्व में जिले के विभिन्न क्षेत्रें से बड़ी संख्या में राइस मिलर्स कलेक्ट्रेट पहुंचे और सरकार के िखलाफ प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जाहिर की। जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे ज्ञापन में वर्षों से लंबित भुगतान जारी करने के साथ चावल का उठान, मंडी शुल्क की प्रतिपूर्ति और कस्टम मिलिंग चार्ज बढ़ाने सहित कई मांगें उठाई गईं।
राइस मिलर्स का सबसे बड़ा मुद्दा वर्षों से अटका भुगतान है। एसोसिएशन का दावा है कि वर्ष 2019 से 2025 तक करीब 500 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित चला आ रहा है। मिलर्स का कहना है कि सरकारी व्यवस्था के तहत धान की मिलिंग करने के बावजूद भुगतान के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर उनकी कार्यशील पूंजी पर पड़ रहा है। बैंक ऋण और ब्याज का बोझ अलग है, जबकि मिलों के रोजमर्रा के खर्च लगातार बढ़ रहे हैं।
पुराना भुगतान ही नहीं, बीते खरीद सत्र की देनदारियां भी मिलर्स की परेशानी बढ़ा रही हैं। एसोसिएशन के अनुसार वर्ष 2025-26 का करीब छह लाख क्विंटल चावल अभी उठान के लिए लंबित है। मिलों और गोदामों में चावल पड़ा रहने से नई फसल के लिए भंडारण और संचालन की समस्या भी पैदा हो सकती है। मिलर्स ने सरकार से लंबित चावल का तत्काल उठान कराने और उससे संबंधित भुगतान निर्धारित समय में जारी करने की मांग की है।
कस्टम मिलिंग चार्ज को लेकर भी राइस मिलर्स की नाराजगी गहरी है। एसोसिएशन का कहना है कि करीब 12 वर्षों से मिलिंग चार्ज में खर्च के अनुपात में उचित बढ़ोतरी नहीं हुई है। इस दौरान बिजली की दरों, श्रमिकों की मजदूरी, मशीनरी, परिवहन, मरम्मत और रखरखाव सहित लगभग हर मद में लागत बढ़ी है। मिलर्स ने कस्टम मिलिंग चार्ज 80 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। इसके समर्थन में छत्तीसगढ़ में विपणन वर्ष 2026-27 के लिए राइस मिलर्स को 80 रुपये प्रति क्विंटल कस्टम मिलिंग प्रोत्साहन दिए जाने का हवाला भी दिया गया है।
मंडी शुल्क एवं उसकी प्रतिपूर्ति की व्यवस्था में भी बदलाव की मांग उठी है। मिलर्स चाहते हैं कि आगामी धान खरीद सत्र से मंडी शुल्क का भुगतान संबंधित विभाग सीधे मंडी समिति को करे। उनका तर्क है कि पहले मिलर्स से राशि जमा कराने और बाद में प्रतिपूर्ति की व्यवस्था के कारण उनकी अतिरिक्त पूंजी लंबे समय तक फंसी रहती है।
प्रदेश अध्यक्ष सत्यवान गर्ग का कहना है कि समस्या अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां मिलर्स के लिए चुप रहना संभव नहीं है। वर्षों से करोड़ों रुपये का भुगतान फंसा है, जबकि बैंक का ब्याज और मिल संचालन का खर्च लगातार देना पड़ रहा है। सरकार से बार-बार समाधान की मांग की गई, लेकिन हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबित भुगतान जारी करने के साथ अन्य समस्याओं का शीघ्र और समयबद्ध समाधान नहीं किया गया तो प्रदेश के राइस मिलर्स आगामी धान खरीद सत्र 2026-27 के सरकारी अनुबंध करने की स्थिति में नहीं होंगे। जरूरत पड़ी तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
प्रदर्शन में गगन गर्ग, अमित जिंदल, राजेंद्र गुप्ता, देवी शंकर अग्रवाल, पंकज बांगा, राजेश बंसल, प्रवेश अग्रवाल, श्याम गर्ग, अजय बंसल, हिमांशु जैन, राजकुमार और सचिन अग्रवाल सहित जिले के विभिन्न क्षेत्रें से बड़ी संख्या में राइस मिलर्स एवं एसोसिएशन पदाधिकारी शामिल हुए।
मिलर्स पीछे हटे तो सरकार के सामने खड़ी हो सकती है नई चुनौती
तराई में धान की सरकारी खरीद केवल क्रय केंद्रों पर किसानों से उपज खरीद लेने तक सीमित नहीं है। खरीद के बाद धान को चावल में बदलकर निर्धारित व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराने में राइस मिलों की अहम भूमिका रहती है। यही कारण है कि आगामी धान खरीद सत्र से पहले मिलर्स की नाराजगी को सामान्य कारोबारी विवाद मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। वर्षों का भुगतान अटकने, लाखों क्विंटल चावल का उठान लंबित रहने और लगातार बढ़ती संचालन लागत के बीच मिलर्स ने यदि वास्तव में सरकारी अनुबंध से दूरी बनाई तो इसका असर पूरी खरीद श्रृंखला पर दिखाई दे सकता है। धान की आवक के समय खरीद, भंडारण और मिलिंग के बीच तालमेल बनाए रखना चुनौती बन सकता है और इसका अप्रत्यक्ष असर किसानों तक भी पहुंचने की आशंका रहेगी। यही वजह है कि खरीद सत्र शुरू होने से पहले सरकार और राइस मिलर्स के बीच लंबित मुद्दों का समाधान अब और महत्वपूर्ण हो गया है। इस बार मिलर्स की चेतावनी साफ हैकृपुराने बकाये और मौजूदा समस्याओं का हल निकले बिना नई जिम्मेदारी उठाना उनके लिए मुश्किल होगा।

