- मिशन विधानसभा की तैयारियों के बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष का उत्तराखंड दौरा
- दो माह बाद फिर उत्तराखंड पहुंचेंगे राष्ट्रीय अध्यक्ष, कमजोर सीटों से सामाजिक समीकरण तक होगी पड़ताल
- विपक्ष की बढ़ती सक्रियता और नए सियासी नैरेटिव के बीच संगठन की जमीनी तैयारी का भी होगा हिसाब
देहरादून। विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का आगामी उत्तराखंड दौरा महज संगठनात्मक प्रवास नहीं, बल्कि चुनाव से पहले पार्टी की जमीनी ताकत और कमजोर कड़ियों की बड़ी पड़ताल माना जा रहा है। करीब दो माह बाद उत्तराखंड आ रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने पिछली समीक्षा में दिए गए लक्ष्यों की प्रगति के साथ उन राजनीतिक चुनौतियों को परखने की भी चुनौती होगी, जो इस बीच नए सिरे से उभरी हैं। कमजोर विधानसभा सीटें, बूथों की सक्रियता, सामाजिक समीकरण, विधायकों की जमीनी स्वीकार्यता और विपक्ष के नए नैरेटिव तक कई मोर्चे इस पड़ताल के केंद्र में रह सकते हैं।
नितिन नवीन के पिछले दौरे में संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और कमजोर विधानसभा क्षेत्रें पर विशेष फोकस करने की रणनीति बनी थी। अब उनका दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। भाजपा सरकार की उपलब्धियों और संगठनात्मक नेटवर्क के सहारे चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटी है तो कांग्रेस ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाई है। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे में भाजपा को अपनी तैयारियों के साथ विपक्ष की रणनीति और उसके संभावित असर को भी पढ़ना होगा।
भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उन 23 विधानसभा क्षेत्रें को लेकर है, जहां पिछले चुनाव में पार्टी जीत दर्ज नहीं कर पाई थी। इन सीटों पर केवल संगठनात्मक कमजोरी तलाशना ही पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता, बूथ समितियों की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, संभावित दावेदार और मतदाताओं के बदलते रुझान भी महत्वपूर्ण होंगे।
इसके साथ ही कम अंतर से जीती गई सीटों को सुरक्षित रखने और मजबूत सीटों पर जीत का अंतर बढ़ाने की चुनौती भी होगी। चुनाव की आहट के साथ टिकट की दावेदारी तेज होना तय है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने दावेदारों की सक्रियता को संगठन की ताकत बनाने और उसे गुटबाजी में बदलने से रोकने की चुनौती भी रहेगी।
हल्द्वानी में कांग्रेस की रैली के बाद सामने आए कथित शुद्धीकरण विवाद ने प्रदेश की राजनीति में नया मुद्दा खड़ा किया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय से जोड़कर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है, लेकिन चुनावी दृष्टि से इसके संभावित सामाजिक प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। ऐसे में विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने के साथ सामाजिक स्तर पर संपर्क और संवाद मजबूत करना भी संगठन के लिए जरूरी होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे में विपक्ष के नए नैरेटिव की काट और सामाजिक समरसता के मोर्चे पर संगठन की रणनीति पर भी मंथन संभव है।
चुनाव नजदीक आने के साथ विधायकों और स्थानीय नेतृत्व की जमीनी स्वीकार्यता का आकलन भी महत्वपूर्ण होगा। सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक कितना पहुंचा, विधायकों का अपने क्षेत्रें में कितना संपर्क है और संगठन तथा जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल कैसा है, इन सवालों का फीडबैक आगे की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही बूथ प्रबंधन और डिजिटल प्रचार के बीच बेहतर तालमेल, महिलाओं, युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने पर भी पार्टी का जोर रहेगा। उत्तराखंड की सामाजिक संरचना को देखते हुए पूर्व सैनिकों और सैनिक परिवारों के साथ संपर्क भी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रह सकता है।
कुल मिलाकर नितिन नवीन का दौरा पिछले दो माह के संगठनात्मक होमवर्क की जांच के साथ आगामी चुनावी मुकाबले की जमीन पढ़ने का अवसर होगा। किन सीटों पर अभी जोिखम बरकरार है, कहां संगठन को अतिरिक्त ताकत लगाने की जरूरत है, विधायकों और स्थानीय नेतृत्व को लेकर जमीन पर क्या माहौल है और विपक्ष के नए मुद्दों का कितना असर हो सकता हैकृइन सवालों के जवाब आगे की रणनीति तय करेंगे। राष्ट्रीय अध्यक्ष की इस पड़ताल के बाद यह भी साफ होगा कि भाजपा अपनी मौजूदा चुनावी जमीन को बचाने और कमजोर मोर्चों पर वापसी के लिए किस तरह का रोडमैप तैयार करती है।
सिर्फ हारी सीटें नहीं, जीती सीटों का भी देना होगा हिसाब
भाजपा की चुनावी रणनीति में 23 कमजोर सीटों की चर्चा सबसे ज्यादा है, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर केवल इन्हीं तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। पिछली बार जीती गई सीटों पर भी पांच साल में परिस्थितियां बदली हैं। कहीं नए दावेदार उभरे हैं तो कहीं विधायकों के कामकाज को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता का फीडबैक महत्वपूर्ण हो सकता है। कुछ सीटों पर पिछली जीत का कम अंतर भी पार्टी को सतर्क करता है। मजबूत मानी जा रही सीट पर नाराजगी समय रहते नहीं पकड़ी गई तो वह कमजोर हो सकती है, जबकि पिछली बार हारी सीट पर मजबूत संगठन और सही चेहरे का चयन तस्वीर बदल सकता है। इसीलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल हारी हुई सीटों पर वापसी की नहीं, बल्कि अपने मौजूदा किले सुरक्षित रखने की भी है।

