कांग्रेस का आरोपः आरक्षण नहीं, यह प्रपंच है, भाजपा का पलटवारः परिवारवाद की रक्षा में महिलाओं का हक मारा
अजय चड्डा, देहरादून
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में इन दिनों महिला आरक्षण को लेकर छिड़ा सियासी घमासान चरम पर है। नारी वंदन अधिनियम संशोधन बिल के संसद में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में गिरने के बाद से ही सूबे की राजनीति ‘आरक्षण’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है। जहाँ सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इसे विपक्ष की ‘महिला विरोधी’ मानसिकता करार देकर हमलावर है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे भाजपा का ‘छलावा और प्रपंच’ बताते हुए मोर्चा खोल दिया है। मंगलवार को देहरादून में विधानसभा भवन के बाहर कांग्रेस का भारी जमावड़ा और धरना प्रदर्शन इस बात का साफ संकेत है कि साल 2027 के विधानसभा चुनाव की पटकथा अब महिलाओं के 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के इर्द-गिर्द ही लिखी जानी शुरू हो गई है। सियासत की इस बिसात पर कांग्रेस के तमाम दिग्गज एक सुर में सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा का सुनियोजित षडड्ढंत्र करार देते हुए कहा कि सरकार वास्तव में महिलाओं को आरक्षण देना ही नहीं चाहती थी। उनके अनुसार, जब साल 2023 में संसद से यह बिल पारित हो चुका था, तो दोबारा संशोधन बिल के साथ ‘परिसीमन’ की शर्त जोड़ना सरकार का एक राजनीतिक फ्ॉड था। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार जानती थी कि परिसीमन पर अभी राष्ट्रीय सहमति नहीं बनी है, इसीलिए जानबूझकर इस जटिल शर्त को बिल से जोड़ा गया ताकि इसे तकनीकी आधार पर गिराया जा सके। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने साफ किया कि भाजपा केवल महिला हितैषी होने का ढोंग कर रही है, जबकि अतीत में निकायों और पंचायतों में महिलाओं को वास्तविक आरक्षण देने का काम कांग्रेस सरकारों ने ही किया था। दूसरी ओर, भाजपा ने इस मुद्दे को अपने सबसे धारदार चुनावी हथियार में तब्दील कर लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीधे तौर पर विपक्ष के परिवारवाद पर प्रहार करते हुए कहा कि जिन नेताओं के घरों की महिलाएं पहले से सत्ता के शीर्ष पदों पर काबिज हैं, वही आज आम महिलाओं को संसद और विधानसभा तक पहुँचने से रोक रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि नारी वंदन अधिनियम को रोकने के लिए विपक्ष ने सदन में जो अड़ंगा लगाया, वह उनकी असल सोच को उजागर करता है। सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कांग्रेस के प्रदर्शन को ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की स्थिति बताते हुए कहा कि विपक्ष ने बिल को पढ़े बिना ही उसका विरोध शुरू कर दिया था। भाजपा अब इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेस ही महिलाओं के सशक्तीकरण में सबसे बड़ी बाधा है। इस पूरे सियासी घमासान के केंद्र में ‘परिसीमन विधेयक 2026’ की शर्त है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। प्रस्तावित परिसीमन के लागू होने से लोकसभा की सीटें 545 से बढ़कर 850 होने का अनुमान है, जिससे देश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। विपक्ष को आशंका है कि आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना केवल इसे अनिश्चितकाल के लिए टालने की एक चाल है। बहरहाल, उत्तराखंड की राजनीति में यह मुद्दा अब केवल बिल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा भावनात्मक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। दोनों ही दल स्वयं को ‘महिला हितैषी’ सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि आने वाले चुनावों में आधी आबादी का वोट ही जीत और हार का फैसला करेगा।
28 अप्रैल को विधानसभा सत्र में ‘आर-पार’ की तैयारी
उत्तराखंड की धामी सरकार ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष को सदन के भीतर घेरने के लिए 28 अप्रैल को विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र आहूत करने का मास्टरस्ट्रोक खेला है। शासन स्तर पर इस सत्र की तैयारियां शुरू हो गई हैं और विभागीय नोडल अधिकारियों की नियुक्तियां भी की जा चुकी हैं। यह सत्र सामान्य विधायी कार्यों के लिए नहीं, बल्कि एक विशेष राजनीतिक संदेश देने के लिए बुलाया जा रहा है। सूत्रें की मानें तो सरकार सदन के पटल पर एक ‘निंदा प्रस्ताव’ लाने की तैयारी में है, जिसका सीधा निशाना विपक्षी दलों पर होगा जिन्होंने संसद में नारी वंदन अधिनियम संशोधन बिल की राह में रोड़ा अटकाया। सरकार की रणनीति बेहद स्पष्ट है-सदन के भीतर विपक्ष को इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर करना और जनता के सामने उन्हें ‘महिला विरोधी’ साबित करना। उत्तर प्रदेश में भी इसी तर्ज पर 30 अप्रैल को सत्र बुलाया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि भाजपा शासित राज्य एक संगठित रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे हैं। उधर, कांग्रेस ने भी इस विशेष सत्र को लेकर अपनी जवाबी रणनीति तैयार कर ली है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि यह सत्र केवल कांग्रेस को कोसने और जनता का ध्यान भटकाने के लिए बुलाया जा रहा है। उत्तराखंड के संसदीय इतिहास में यह विशेष सत्र काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं, क्योंकि यहाँ चर्चा विकास की फाइलों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक शुचिता और महिला अधिकारों के दावों पर होनी है।

