चुनावी दंगल से पहले रुद्रपुर कांग्रेस में मचे घमासान को थामना नहीं होगा आसान
उत्तराखण्ड सत्य,रुद्रपुर
उत्तराखंड की सियासत में सियासी दलबदल और घर वापसी के दौर के बीच रुद्रपुर की राजनीति में घमासान मचा है। पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल ने कांग्रेस का हाथ थामकर अपनी नई पारी का आगाज तो कर दिया है, लेकिन उनके लिए आगामी 2027 के चुनावी रण में उतरने से पहले विरोधियों से ज्यादा अपनों की घेराबंदी तोड़ना सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो रही है। कांग्रेस में ठुकराल की एंट्री ने पार्टी के भीतर उत्साह के बजाय एक नया घमासान छेड़ दिया है, जिससे न केवल कांग्रेस असहज है, बल्कि विरोधी खेमों में भी जबरदस्त बेचौनी देखी जा रही है। रुद्रपुर कांग्रेस के लिए गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन ठुकराल के आने के बाद यह दरार अब एक गहरी खाई में बदलती दिख रही है। पार्टी के भीतर सबसे प्रखर विरोध पूर्व पालिकाध्यक्ष मीना शर्मा की ओर से सामने आया है। ठुकराल के शामिल होते ही मीना शर्मा ने अपने तीनों संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देकर न केवल बगावती तेवर दिखाए, बल्कि पार्टी नेतृत्व को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। उनका साफ कहना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बैनर तले लड़ते समय ठुकराल ने जिस तरह उनके परिवार और महिला कार्यकर्ताओं को अपमानित किया था, उसे भुला पाना नामुमकिन है। मीना शर्मा का देशी समाज और महिलाओं में मजबूत जनाधार रहा है, और उनके भाजपा में जाने की अटकलों ने कांग्रेस की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। चुनौती केवल मीना शर्मा तक ही सीमित नहीं है। ठुकराल की पहचान लंबे समय तक एक कट्टðर हिंदूवादी नेता की रही है। भाजपा में रहते हुए उनके द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर दिए गए पुराने बयानों की गूंज अब कांग्रेस के भीतर सुनाई दे रही है। मुस्लिम समाज के कई स्थानीय नेता और कार्यकर्ता ठुकराल की जॉइनिंग को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उनके लिए ठुकराल की बदली हुई राजनीतिक विचारधारा पर भरोसा करना एक बड़ी मानसिक और वैचारिक बाधा बनी हुई है। रुद्रपुर में कांग्रेस के पुराने दिग्गजों और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बीच एक अघोषित युद्ध की स्थिति है। पार्टी का एक धड़ा ठुकराल को बाहरी मानकर उनके नेतृत्व को पचा नहीं पा रहा है। ऐसे में ठुकराल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे चुनाव से पहले बिखरी हुई कांग्रेस को एक सूत्र में कैसे पिरोएं। यदि वे पार्टी के भीतर चल रही इस गुटबाजी और भीतरघात के खतरे को समय रहते नियंत्रित नहीं कर पाते, तो सत्ता पक्ष का मुकाबला करना उनके लिए नामुमकिन सा हो जाएगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ठुकराल अपने राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल कर विरोधियों को मनाने में सफल होते हैं या फिर कांग्रेस की यह पुरानी बीमारी 2027 की राह में उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा बनेगी। फिलहाल, रुद्रपुर की राजनीति में ठुकराल की एंट्री ने चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल तो शुरू कर दिया है, लेकिन उनकी अपनी ही सेना के कुछ सेनापति फिलहाल बागी नजर आ रहे हैं।

