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    Home » बदरीनाथ-केदार धाम में गैर-सनातनी प्रवेश पर छिड़ी नई बहस
    उत्तराखंड

    बदरीनाथ-केदार धाम में गैर-सनातनी प्रवेश पर छिड़ी नई बहस

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यMarch 22, 2026No Comments4 Mins Read
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    बीकेटीसी ने अनुच्छेद-26 को बनाया अपनी ढाल, मुख्यमंत्री ने दी व्यापक विचार-विमर्श की सलाह
    उत्तराखण्ड सत्य,देहरादून

    देवभूमि उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ और केदारनाथ धाम की शुचिता और मर्यादा को लेकर एक बार फिर नई चर्चा शुरू हो गई है। बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) द्वारा मंदिरों में गैर-सनातनियों के प्रवेश पर रोक लगाने के निर्णय ने न केवल धार्मिक बल्कि कानूनी और राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि आिखर दशकों से चली आ रही व्यवस्था में इस बड़े बदलाव को कानूनी रूप से कैसे लागू किया जाएगा। क्या इसके लिए वर्ष 1939 के ऐतिहासिक श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर अधिनियम में कोई बड़ा संशोधन किया जाएगा या फिर किसी नए बायलॉज के जरिए इसे अमलीजामा पहनाया जाएगा। इन तमाम अटकलों के बीच मंदिर समिति ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। समिति का तर्क है कि इस निर्णय के लिए किसी विधायी संशोधन की आवश्यकता नहीं है। बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए बोर्ड बैठक में यह निर्णय लिया गया है और इसे आधिकारिक मिनट्स में भी शामिल कर लिया गया है। समिति का मानना है कि एक वैधानिक संस्था के रूप में उसे पूजा-पद्धति और मंदिर की परंपराओं की रक्षा करने का पूरा अधिकार है। जानकारों के अनुसार, अनुच्छेद-25 और 26 के बीच का यह संतुलन ही वह आधार है जिस पर मंदिर समिति अपनी नई व्यवस्था को टिकाए हुए है। इस संवेदनशील मसले पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी है। मुख्यमंत्री का रुख इस मामले में बेहद संतुलित और समावेशी नजर आ रहा है। उन्होंने साफ किया है कि कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी तीर्थ समितियों, पूज्य संतों, गंगा सभा और केदार सभा जैसे प्रमुख हितधारकों के साथ गहन मंत्रणा की जाएगी। मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ये स्थल केवल पर्यटन केंद्र नहीं बल्कि हमारी प्राचीन आस्था के प्रतीक हैं, इसलिए इनके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को देखते हुए पुराने कानूनों की समीक्षा की जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि सरकार केवल मंदिरों तक ही सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि हरिद्वार और ऋषिकेश को श्सनातन पवित्र शहरश् घोषित करने की दिशा में भी कदम बढ़ा सकती है। हालांकि, सत्ता पक्ष की इस सक्रियता पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश ोदियाल ने सरकार पर संकीर्ण मानसिकता का आरोप लगाते हुए कहा कि धर्म के प्रचार-प्रसार की संभावनाओं को इस तरह सीमित करना अनुचित है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार इन पवित्र स्थलों की सुरक्षा करने में अक्षम है, जो इस तरह के प्रतिबंधों का सहारा ले रही है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने वैश्विक संदर्भ देते हुए कहा कि दुनिया भर के धर्म अपने पूजा स्थलों की ओर लोगों को आकर्षित करते हैं ताकि उनकी महानता का विस्तार हो सके, लेकिन यहाँ एक नई और विपरीत परंपरा की शुरुआत की जा रही है। मंदिर समिति की आगामी बोर्ड बैठक अब इस दिशा में निर्णायक साबित होने वाली है, जहाँ अन्य संबद्ध मंदिरों में भी इस प्रतिबंध को लागू करने का प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। वर्तमान में जहाँ एक ओर आस्था और परंपराओं की रक्षा का तर्क दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर समावेशिता और वैश्विक प्रचार के सिद्धांतों पर बहस छिड़ी हुई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और मंदिर समिति संतों के सुझावों और विपक्ष के विरोध के बीच किस तरह का अंतिम रास्ता निकालती है, ताकि देवभूमि की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा दोनों अक्षुण्ण बनी रहें।

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