भाजपा का ‘सुपरफास्ट’ चुनावी मिशन, अपनों की ही ‘फांस’ में उलझी कांग्रेस
अजय चड्डा, देहरादून
उत्तराखंड की ठंडी वादियों में इन दिनों सियासी पारा चढ़ने लगा है। पहाड़ की राजनीति के दो ध्रुव- भाजपा और कांग्रेस अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं, लेकिन दोनों के इंजन की गति में जमीन- आसमान का अंतर साफ दिखाई दे रहा है। जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपनी पूरी मशीनरी के साथ ‘चुनावी मोड’ के पांचवें गियर में नजर आ रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खेमे में हलचल तो है, लेकिन निर्णय लेने की रफ्तार अभी भी कछुआ चाल से आगे बढ़ रही है। बड़े नेताओं की मौजूदगी से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक, देवभूमि की सियासत का मौजूदा परिदृश्य यह बताने के लिए काफी है कि एक तरफ ‘मिशन मोड’ है तो दूसरी तरफ ‘मंथन का दौर’। गमुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार आगामी 23 मार्च को अपने सफल चार साल पूरे करने जा रही है। भाजपा इस अवसर को केवल एक सरकारी उत्सव नहीं, बल्कि 2027 की तैयारियों के ‘लॉन्चिंग पैड’ के रूप में देख रही है। सरकार की उपलब्धियों को घर-घर पहुंचाने के लिए जिलों में बड़े आयोजनों की रूपरेखा तैयार है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो इन चार सालों का लेखा-जोखा जनता के बीच ले जाना भाजपा की उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को विकास की चर्चा से दबाना चाहते हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी इस समय उत्तराखंड को लेकर बेहद गंभीर है। गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नîóा जैसे कद्दावर नेताओं के दौरों ने न केवल कार्यकर्ताओं में जोश भरा है, बल्कि संगठन को बूथ स्तर तक अभेद्य बनाने का टास्क भी दे दिया है। शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता यह साफ करती है कि भाजपा अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की स्थिति उस िखलाड़ी जैसी है जो मैदान में उतरने को बेताब है, लेकिन जिसकी किट अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल निस्संदेह सड़क पर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं और जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे, लेकिन संगठन के भीतर का श्स्ट्रक्चरश् अभी भी अधूरा है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी फांस उसकी प्रदेश कार्यकारिणी का गठन न हो पाना है। हफ्तों से सूचियां बन रही हैं, नाम दिल्ली से देहरादून के बीच तैर रहे हैं, लेकिन अंतिम मुहर नहीं लग पा रही है। जिला और ब्लॉक स्तर पर भी बदलाव की कवायद कागजों तक ही सीमित है। जब तक सेनापति के पास उसकी पूरी फौज (कार्यकारिणी) नहीं होगी, तब तक केवल बड़े नेताओं के व्यक्तिगत संघर्ष के दम पर भाजपा के संगठनात्मक तंत्र से लोहा लेना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुरेश जोशी का मानना है कि उनकी पार्टी साल के 365 दिन चुनावी मोड में रहती है, क्योंकि उनका संगठन बूथ स्तर पर जीवंत है। वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल बिष्ट का तर्क है कि वे जनता के बीच सरकार की विफलताओं को लेकर जा रहे हैं और संगठन को धार देने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस समय रहते अपने आंतरिक अंतर्विरोधों को सुलझाकर भाजपा के श्डबल इंजनश् के सामने खड़ी हो पाएगी, या फिर भाजपा की यह सक्रियता विपक्ष को संभलने का मौका ही नहीं देगी?
भाजपा का ‘बूथ विजय’ मंत्र बनाम कांग्रेस का ‘इंतजार’
उत्तराखंड की राजनीति में इस समय दो अलग-अलग कार्यसंस्कृतियां आमने-सामने हैं। भाजपा जहां पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर की बैठकों के जरिए अपनी जमीन पुख्ता कर रही है, वहीं कांग्रेस में दिल्ली दरबार के फैसलों का इंतजार संगठन की गति को बाधित कर रहा है। भाजपा ने अपने चार साल के कार्यकाल के बहाने एक ऐसा नैरेटिव सेट कर दिया है जिसमें विकास योजनाओं, धार्मिक पर्यटन और इन्फ्ास्ट्रक्चर को केंद्र में रखा गया है। इसके विपरीत, कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं हैकृमहंगाई, बेरोजगारी और अंकिता भंडारी केस जैसे संवेदनशील विषय उनके हाथ में हैं लेकिन इन मुद्दों को एक संगठित वोट बैंक में तब्दील करने के लिए जिस संगठनात्मक ढांचे की जरूरत होती है, वह अभी भी लापता है। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और समीकरणों को साधने की मजबूरी इस कदर हावी है कि प्रदेश कार्यकारिणी का गठन एक पेचीदा पहेली बन गया है। पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर सुगबुगाहट है कि यदि समय रहते संगठन के पदों का बंटवारा नहीं हुआ, तो चुनावी समर में भाजपा की बढ़त को काटना नामुमकिन होगा। उत्तराखंड का मतदाता हमेशा से बदलाव और स्थिरता के बीच झूलता रहा है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा की ‘रफ्तार’ भारी पड़ती है या कांग्रेस का ‘धैर्य’ रंग लाता है।

