अभिषेक प्रकरण में करीबी के परिजन के बजाय पीड़ित परिवार का दिया साथ
रुद्रपुर। राजनीति में जनप्रतिनिधियों के सामने सबसे कठिन परिस्थितियां तब आती हैं, जब किसी संवेदनशील मामले में व्यक्तिगत संबंध और सार्वजनिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़े हो जाएं। रुद्रपुर के चर्चित अभिषेक वाल्मीकि प्रकरण में महापौर विकास शर्मा की भूमिका इसी कसौटी पर देखी जा रही है। हादसे में आरोपी पक्ष से जुड़े लोगों से उनके करीबी संबंध होने के बावजूद महापौर ने पूरे घटनाक्रम में पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने का रास्ता चुना। हादसे के बाद से लेकर अभिषेक के उपचार और उसके निधन तक उनकी सक्रियता लगातार बनी रही।
7 अगस्त की रात काशीपुर रोड पर कार की टक्कर से गांधी कॉलोनी निवासी अभिषेक वाल्मीकि गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अभिषेक नगर निगम में कार्यरत महिला सफाई कर्मचारी के इकलौते बेटे थे। प्रारंभिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए बरेली के राममूर्ति अस्पताल ले जाया गया। हादसे के अगले दिन महापौर विकास शर्मा पीपली जंगल स्थित धाम में धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे। जंगल क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क की समस्या के कारण उन्हें हादसे और उसके बाद बने हालात की तत्काल जानकारी नहीं मिल सकी। इसी दौरान मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गईं तथा पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया गया।
महापौर पर आरोपी पक्ष के प्रति कथित पक्षधरता के आरोप भी लगाए गए। हालांकि, पीपली जंगल से लौटने के बाद जब उन्हें पूरे मामले की जानकारी मिली तो वे सीधे कोतवाली पहुंचे और वहां मौजूद लोगों से बातचीत कर स्थिति को शांत कराने का प्रयास किया।
कोतवाली में विवाद बढ़ने के बजाय महापौर ने सीधे बरेली के राममूर्ति अस्पताल जाने का निर्णय लिया। वहां उन्होंने गंभीर हालत में भर्ती अभिषेक का हाल जाना और उसके परिजनों से मुलाकात की। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि हादसे में आरोपी पक्ष से जुड़े व्यक्ति महापौर के राजनीतिक रूप से करीबी लोगों में शामिल रहे हैं। इसके बावजूद महापौर ने सार्वजनिक रूप से पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने का फैसला किया।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब नगर निगम के पर्यावरण मित्रें और वाल्मीकि समाज ने आरोपी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर धरना और कार्यबहिष्कार शुरू कर दिया। इस दौरान महापौर स्वयं धरना स्थल पर पहुंचे और आंदोलनकारियों के बीच बैठ गए। महापौर ने प्रशासन से आरोपी की गिरफ्तारी की मांग करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक गिरफ्तारी नहीं होती, वे भी धरना स्थल से नहीं उठेंगे। इसी दौरान आरोपी की गिरफ्तारी की सूचना धरना स्थल पर पहुंची, जिसके बाद आंदोलन समाप्त किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने महापौर की भूमिका को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं को भी नया मोड़ दिया। जिस व्यक्ति के बारे में यह आरोप लगाए जा रहे थे कि वह आरोपी पक्ष के करीबी होने के कारण बचाव कर सकता है, वही व्यक्ति पीड़ित पक्ष की गिरफ्तारी की मांग के समर्थन में धरने पर बैठा दिखाई दिया।
धरना समाप्त होने के बाद भी महापौर ने मामले से दूरी नहीं बनाई। वे दोबारा राममूर्ति अस्पताल पहुंचे और चिकित्सकों से अभिषेक के उपचार की जानकारी लेते रहे। परिवार को उपचार के दौरान हरसंभव सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास भी किया गया। अभिषेक की हालत गंभीर होने पर उसे ऋषिकेश एम्स ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसका निधन हो गया। अभिषेक की मौत की खबर के बाद शहर में शोक का माहौल बन गया।
इस दुखद स्थिति में भी महापौर ने पीड़ित परिवार से संपर्क बनाए रखा। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उचित आर्थिक सहायता दिलाने तथा मृतक की मां, जो नगर निगम में आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत हैं, के लिए स्थायी रोजगार की संभावनाओं को लेकर हरसंभव प्रयास करने की बात कही।
रिश्तों से बड़ा कर्तव्य का संदेश
अभिषेक प्रकरण ने रुद्रपुर की स्थानीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया-क्या राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध किसी जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक जिम्मेदारी से ऊपर हो सकते हैं? महापौर विकास शर्मा के मामले में घटनाक्रम का उनका पक्ष यही संकेत देता है कि उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों से अधिक पीड़ित परिवार और जनभावनाओं को प्राथमिकता दी। भाजपा मंडल महामंत्री पारस चुघ से उनकी निकटता और राजनीतिक सहयोग किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में आरोपी पक्ष से जुड़े पारिवारिक संबंधों के बावजूद पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अभिषेक प्रकरण में महापौर की सक्रियता ने कम से कम इतना संदेश जरूर दिया है कि जनप्रतिनिधि के लिए व्यक्तिगत रिश्तों और सार्वजनिक दायित्व के बीच चुनाव की स्थिति आए तो जनता के प्रति जिम्मेदारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को अब केवल एक सड़क हादसे या राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं, बल्कि एक जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत संबंधों के बीच खड़े हुए कठिन निर्णय के रूप में भी देखा जा रहा है।

