ग्लेशियर झीलों से तबाही रोकने को उत्तराखंड में पहली बार रियल टाइम निगरानी, वसुंधरा ताल से शुरू हुआ अर्ली वार्निंग सिस्टम
देहरादून। पहाड़ों में बदलते मौसम और बढ़ते ग्लेशियर झीलों के खतरे के बीच उत्तराखंड ने आपदा से पहले खतरे को पहचानने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रें में मौजूद संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी। चमोली जिले की वसुंधरा ताल में प्रदेश का पहला ग्लेशियर लेक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है। वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम 29 सितंबर से इस अभियान में जुटी है। इस व्यवस्था का मकसद ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की आशंका को समय रहते पहचानना है। झील का जलस्तर अचानक बढ़े, पानी के बहाव में असामान्य बदलाव आए, मौसम की स्थिति बदले या आसपास बर्फ और जमीन की गतिविधियों में परिवर्तन होकृसिस्टम इन संकेतों को रिकॉर्ड करेगा। तय मानकों में असामान्य बदलाव सामने आने पर अलर्ट तैयार करने में मदद मिलेगी। वसुंधरा ताल में लगने वाली व्यवस्था सिर्फ पानी का स्तर मापने तक सीमित नहीं होगी। इसमें जलस्तर, तापमान, बारिश, हवा की गति और दिशा, बर्फ की स्थिति, पानी के बहाव और आसपास की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। सिस्टम से मिलने वाला डेटा सैटेलाइट के माध्यम से भेजा जाएगा। ऊंचाई वाले क्षेत्रें में मोबाइल नेटवर्क की सुविधा नहीं होने के कारण सैटेलाइट संचार को निगरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। उपकरणों को सौर ऊर्जा से संचालित करने की व्यवस्था भी की जा रही है। उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरे को लेकर स्थिति गंभीरता से समझने के लिए वैज्ञानिक सर्वे किए जा रहे हैं। राज्य में 13 उच्च जोिखम वाली ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं। इनमें छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वे पूरा हो चुका है। इस सर्वे से झील की गहराई और उसमें मौजूद पानी की क्षमता जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आती हैं, जिनका इस्तेमाल संभावित ळस्व्थ् के खतरे का आकलन करने में किया जा सकता है। इन उच्च जोिखम वाली झीलों में छह पिथौरागढ़, चार चमोली तथा एक-एक बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी में बताई गई हैं। उत्तराखंड की नई पहल की खास बात यह है कि निगरानी अब केवल ग्लेशियर झीलों की पहचान और मैपिंग तक सीमित नहीं रहेगी। वसुंधरा ताल से शुरू हो रही व्यवस्था का उद्देश्य रियल टाइम डेटा के जरिए झीलों में हो रहे बदलावों को लगातार पकड़ना है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को रवाना करते हुए इसे ळस्व्थ् के जोिखम को समझने और कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है। आपदा प्रबंधन विभाग भी ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और जोिखम न्यूनीकरण के लिए आधुनिक तकनीक अपनाने पर जोर दे रहा है। ग्लेशियल झील के अचानक फटने से निकलने वाला पानी नीचे की ओर तेज बहाव के साथ पहुंच सकता है। ऐसे में इसका असर नदी घाटियों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं तक हो सकता है। इसलिए अर्ली वार्निंग सिस्टम का असली उद्देश्य सिर्फ झील की निगरानी करना नहीं, बल्कि खतरे के संकेत मिलने पर नीचे के संभावित प्रभावित क्षेत्रें को समय रहते सतर्क करने की व्यवस्था तैयार करना है।
खतरे से पहले क्या पता चलेगा?
जलस्तरः झील में पानी अचानक बढ़ रहा है या नहीं।
मौसमः तापमान, बारिश, हवा और अन्य मौसमी बदलाव।
बर्फः बर्फ की मोटाई और स्थिति में बदलाव।
बहावः पानी के डिस्चार्ज में असामान्य परिवर्तन।
गतिविधिः झील के आसपास जमीन और अन्य संरचनात्मक बदलाव।
संचारः सैटेलाइट के जरिए दूरस्थ क्षेत्र से डेटा भेजने की व्यवस्था।

