- संत रविदास के बहाने चुनावी समरसता की सियासत
- 650वीं जयंती अभियान से भाजपा का दलित वोट बैंक पर फोकस,
- 107 रविदास मंदिरों को बनाया जाएगा अभियान का केंद्र
- बूथ स्तर तक सामाजिक संवाद और कलश यात्रओं की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने सामाजिक समीकरणों की बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी ने संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती को केंद्र में रखकर ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू किया है। पार्टी इसे सामाजिक समरसता, समानता और सांस्कृतिक जागरण का अभियान बता रही है, जबकि विपक्ष इसे दलित वोट बैंक तक पहुंच बनाने की सुनियोजित चुनावी रणनीति करार दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह अभियान केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश के करीब 17 प्रतिशत दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत करने की एक व्यापक कवायद भी है। अभियान की शुरुआत 29 जुलाई को गुरु पर्व के अवसर पर दीप प्रज्ज्वलन के साथ की गई है और यह आगामी वर्ष 20 फरवरी 2027 तक चरणबद्ध तरीके से चलेगा। उत्तराखंड में संत रविदास के 107 मंदिरों को इस अभियान का केंद्र बनाया गया है। वाराणसी स्थित श्री गुरु रविदास जन्मस्थली, सीर गोवर्धनपुर से पवित्र मिट्टी और कलश प्रदेश में पहुंचेंगे, जिनके स्वागत के साथ कलश यात्रएं, सामाजिक संवाद, संगोष्ठियां और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन आयोजनों के माध्यम से भाजपा सामाजिक समरसता का संदेश देने के साथ-साथ बूथ स्तर तक अपने संगठनात्मक नेटवर्क को भी मजबूत करने की तैयारी में है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है जब उत्तराखंड की अनेक विधानसभा सीटों पर दलित मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। हरिद्वार के अलावा देहरादून का पछवादून क्षेत्र, डोईवाला, ऋषिकेश, ऊधम सिंह नगर और नैनीताल जिले की कई सीटों पर दलित मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। यही कारण है कि भाजपा सामाजिक अभियानों के माध्यम से अपने जनाधार का विस्तार करने में जुटी है, जबकि कांग्रेस, बसपा और भीम आर्मी जैसे दल भी इसी सामाजिक आधार को अपने पक्ष में बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। हालांकि उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अन्य राज्यों से कुछ अलग हैं। यहां दलित समाज केवल राष्ट्रीय संतों और प्रतीकों से ही नहीं, बल्कि जयानंद भारती, हरि प्रसाद टम्टा और खुशी राम आर्य जैसे स्थानीय समाज सुधारकों और नेताओं से भी गहरा जुड़ाव रखता है। ऐसे में सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही होगा कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जा रहा यह समरसता अभियान प्रदेश के स्थानीय सामाजिक नेतृत्व और पहचान पर प्रभाव छोड़ पाएगा, या फिर उत्तराखंड की राजनीति स्थानीय सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द ही आगे बढ़ती रहेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी सामाजिक अभियानों के जरिए शुरू हो चुकी है। आने वाले महीनों में दलित समाज को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता और तेज होने की संभावना है। ऐसे में उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में दलित मतदाता एक बार फिर सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाते दिखाई दे सकते हैं।
फरवरी 2027 तक चलेगा चरणबद्ध अभियान
भाजपा के ऊधम सिंह नगर जिलाध्यक्ष कमल जिंदल के अनुसार, 29 जुलाई से 10 सितंबर तक कलश वंदन अभियान, 29 जुलाई से 31 अगस्त तक जनसंपर्क अभियान तथा 5 अक्टूबर से 5 नवंबर तक सचखंड बल्लां (जालंधर) से वाराणसी तक राष्ट्रीय यात्र आयोजित की जाएगी। उत्तराखंड के 107 रविदास मंदिरों में कलश पूजन, सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। उनका कहना है कि अभियान का उद्देश्य संत गुरु रविदास के समरसता, समानता, सामाजिक न्याय और मानवता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे सामाजिक संदेश के साथ-साथ चुनावी वर्ष से पहले संगठन विस्तार की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं।

