किच्छा में चेयरमैन नहीं, साख की लड़ाई
पालिका चुनाव बना बेहड़ बनाम शुक्ला का मुकाबला, 2027 से पहले सेमीफाइनल जैसी सियासी टक्कर
किच्छा। नगर पालिका परिषद किच्छा का इस बार का चुनाव केवल चेयरमैन चुनने की औपचारिक प्रक्रिया भर नहीं रह गया है। यह चुनाव अब सीधे-सीधे दो बड़े सियासी चेहरों की प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। एक ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं मौजूदा विधायक तिलक राज बेहड़ हैं, तो दूसरी ओर भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला। दोनों नेताओं ने अपने-अपने समर्थकों को अध्यक्ष पद की लड़ाई में उतारकर इस मुकाबले को साधारण स्थानीय चुनाव से कहीं अधिक बड़ा बना दिया है।
ऊपरी तौर पर मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच दिख रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे बेहड़ बनाम शुक्ला की सीधी प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि दोनों नेता इस चुनाव को लेकर पूरी तरह सक्रिय हैं। गली-गली जनसंपर्क, मोहल्ला बैठकों, कार्यकर्ता संवाद और बूथ स्तरीय रणनीति तक हर मोर्चे पर उनकी सीधी मौजूदगी यह बता रही है कि यह चुनाव उनके लिए केवल संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत राजनीतिक साख का प्रश्न बन चुका है।
दरअसल किच्छा विधानसभा क्षेत्र की राजनीति हमेशा से संवेदनशील और बहुस्तरीय रही है। यहां का सामाजिक समीकरण ऐसा है, जिसमें सिख, बंगाली, पंजाबी और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यही वजह है कि पालिका चुनाव का परिणाम सिर्फ स्थानीय निकाय की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि इन प्रभावशाली सामाजिक समूहों के बीच किस नेता की पकड़ अधिक मजबूत है और किसकी राजनीतिक स्वीकार्यता ज्यादा प्रभावशाली बनी हुई है।
इस चुनाव को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले का सियासी सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। नगर पालिका का परिणाम सीधे यह संदेश देगा कि किच्छा की जमीन पर कांग्रेस और भाजपा में से किसकी पकड़ मजबूत है, किसका संगठन अधिक सक्रिय है और किस नेता का प्रभाव अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर नए तबकों तक पहुंच रहा है। स्थानीय चुनावों में अक्सर मतदाता का मूड बड़े चुनावों की भूमिका तैयार करता है, इसलिए यह मुकाबला भविष्य की सियासी दिशा का संकेतक भी बन सकता है।
भाजपा ने इस चुनाव में विकास और ट्रिपल इंजन सरकार के नारे को प्रमुखता दी है। उसका प्रयास यह संदेश देने का है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायकृतीनों स्तरों पर एक ही दल की सरकार होने से विकास कार्यों में गति आएगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय समस्याओं को चुनावी बहस के केंद्र में रखने की कोशिश की है। जलभराव, भ्रष्टाचार और स्थानीय उपेक्षा जैसे मुद्दों को उभारते हुए कांग्रेस जनता के असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलना चाहती है।
यही कारण है कि चुनावी मुकाबला केवल प्रत्याशियों के व्यक्तित्व या उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे दो बड़े राजनीतिक नैरेटिव भी आमने-सामने हैं-एक ओर विकास और सत्ता समन्वय का दावा, तो दूसरी ओर स्थानीय समस्याओं और जन असंतोष का सवाल। मतदाता इन दोनों के बीच किसे ज्यादा महत्व देता है, यह नतीजे के दिन साफ हो जाएगा।
किच्छा की सियासत में यह चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि यहां की पालिका का परिणाम आगे की राजनीतिक रणनीति तय करने में मदद करेगा। जीत भाजपा की होती है तो इसे राजेश शुक्ला की जमीनी सक्रियता और संगठनात्मक पकड़ के तौर पर देखा जाएगा। वहीं अगर कांग्रेस बाजी मारती है तो तिलक राज बेहड़ की प्रभावशीलता और उनके सामाजिक समीकरणों पर मजबूत पकड़ का संदेश जाएगा। इस लिहाज से चेयरमैन की कुर्सी भले एक हो, लेकिन इस पर टिकी नजरें स्थानीय राजनीति से कहीं आगे तक फैली हुई हैं।
कुल मिलाकर किच्छा नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव इस बार साधारण चुनाव नहीं, बल्कि साख, समीकरण और 2027 की तैयारी का बड़ा राजनीतिक मंच बन गया है। नतीजा चाहे जिस प्रत्याशी के पक्ष में जाए, उसका संदेश केवल किच्छा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देहरादून से लेकर दिल्ली तक उसकी राजनीतिक गूंज सुनाई देगी।

