राज्यसभा टिकट से हल्द्वानी और कुमाऊं की सियासत में नए समीकरण
दलित प्रतिनिधित्व, कुमाऊं को हिस्सेदारी और पुराने संगठन कार्यकर्ता को सम्मानकृएक टिकट में दिखे कई संदेश
देहरादून। उत्तराखंड की एक राज्यसभा सीट के लिए भाजपा ने हल्द्वानी के दिनेश आर्य को प्रत्याशी बनाकर लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया। आर्य ने मंगलवार को नामांकन भी दािखल कर दिया। कांग्रेस ने प्रत्याशी नहीं उतारा है, ऐसे में उनका निर्विरोध निर्वाचन तय माना जा रहा है। मौजूदा राज्यसभा सदस्य नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है और सीट के लिए 16 अक्टूबर को मतदान प्रस्तावित है। आर्य की उम्मीदवारी को केवल एक राज्यसभा टिकट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषण में इसके क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कई पहलू सामने आ रहे हैं। करीब 12 साल बाद कुमाऊं से भाजपा के किसी नेता को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिलने जा रहा है। मौजूदा भाजपा राज्यसभा सदस्यों नरेश बंसल, महेंद्र भट्टð और कल्पना सैनी की राजनीतिक पृष्ठभूमि गढ़वाल से जुड़ी है। आर्य की उम्मीदवारी ऐसे समय में सामने आई है, जब आठ अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी सभा के बाद रामलीला मैदान में कथित शुद्धीकरण को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस ने इसे दलित सम्मान से जोड़कर भाजपा पर सवाल उठाए, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। भाजपा की ओर से आधिकारिक तौर पर आर्य की उम्मीदवारी को इस विवाद से नहीं जोड़ा गया है। इसके बावजूद राजनीतिक हलकों में दोनों घटनाक्रमों को जोड़कर चर्चा हो रही है। दिनेश आर्य ने 1985 में विद्यार्थी परिषद के माध्यम से संगठनात्मक जीवन की शुरुआत की। वह भाजपा के नैनीताल जिलाध्यक्ष रह चुके हैं और 2017 से 2020 तक भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे के राष्ट्रीय मंत्री रहे। 2021 में वह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनसंपर्क अधिकारी रहे और 2023 में उन्हें राज्य स्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद का उपाध्यक्ष बनाया गया। आर्य ने 2022 में नैनीताल विधानसभा सीट से दावेदारी भी की थी। उस समय भाजपा ने सरिता आर्य को प्रत्याशी बनाया। अब विधानसभा की संभावित राजनीति से आगे बढ़ाते हुए पार्टी ने उन्हें सीधे राज्यसभा की राह दिखाई है। उत्तराखंड बनने के बाद भाजपा की ओर से कई नेता राज्यसभा पहुंचे हैं। दिनेश आर्य की उम्मीदवारी को अनुसूचित जाति समाज से आने वाले नेता के रूप में अलग महत्व मिल रहा है। हालांकि इसे राज्य गठन के बाद भाजपा का पहला दलित राज्यसभा चेहरा बताया जा रहा है, क्योंकि इससे पहले के भाजपा राज्यसभा प्रतिनिधित्व में संघप्रिय गौतम का नाम भी आता है, जिनका राज्यसभा कार्यकाल उत्तराखंड राज्य गठन से पहले का था।
एक टिकट में तीन संदेश
आर्य की उम्मीदवारी में कुमाऊं को प्रतिनिधित्व, अनुसूचित जाति समाज से आने वाले नेता को उच्च सदन में भेजना और लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता को जिम्मेदारी देनाकृतीन प्रमुख पहलू दिखाई देते हैं। भाजपा नेताओं ने भी इसे संगठन के पुराने और समर्पित कार्यकर्ता के सम्मान के रूप में बताया है।

