निकाय चुनाव के नतीजों ने तय किया किच्छा का राजनैतिक पावर सेंटर,
रूद्रपुर। उत्तराखंड की तराई की राजनीति में किच्छा और सिरौली कलां नगर पालिका चुनाव महज स्थानीय निकाय चुनाव नहीं, बल्कि दो दिग्गज क्षत्रपों के बीच वर्चस्व की महा-जंग साबित हुए हैं। मतदान के दिन की लाठियां, हाइवे पर बवाल, स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर आंसू और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चली कानूनी लड़ाई के बाद जब मतपेटियों के बक्से खुले, तो परिणामों ने उत्तराखंड की सियासत में एक नया भूचाल ला दिया है। इस जंग में कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ ने अपने धुर विरोधी और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला को चित कर यह साबित कर दिया कि किच्छा के राजनीतिक मैदान में फिलहाल उनका ही सिक्का चलता है। इस चुनाव की पटकथा जितनी दिलचस्प थी, क्लाइमेक्स उतना ही धमाकेदार रहा। मतदान के बाद 22 सितंबर को नवीन मंडी परिसर में स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर जो हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, वह तराई के इतिहास में दर्ज हो गया है। मतपेटियों पर पर्दा डालने और धांधली के आरोपों को लेकर दोनों दलों के दिग्गज-विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला आमने-सामने आ गए थे। नौबत यहां तक आई कि पुलिस के सामने समर्थकों में झड़प हुई, लाठीचार्ज हुआ और दोनों खेमों के आंसू और आक्रोश ने माहौल को गर्मा दिया। मामला हाईकोर्ट से होता हुआ जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत के आदेश के बाद जाकर 7 अक्टूबर को वोटों की गिनती का रास्ता साफ हुआ। जब परिणाम घोषित हुए तो आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में सुनामी लेकर आए। किच्छा नगर पालिका अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा को 6 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से करारी शिकस्त दी। किच्छा में कुल पड़े मतों में कांग्रेस ने एकतरफा बढ़त बनाई। वहीं, सिरौली कलां नगर पालिका सीट पर भी कांग्रेस प्रत्याशी राशिदा बेगम ने निर्दलीय प्रत्याशी को 1,773 वोटों से मात देते हुए जीत का परचम लहराया। दोनों ही निकायों में कांग्रेस का यह क्लीन स्वीप इस बात का प्रमाण है कि भले ही टिकट पर नाम किसी और का था, लेकिन चुनाव का पूरा प्रबंधन और रणनीति खुद विधायक तिलकराज बेहड़ चला रहे थे। यह हार सिर्फ किच्छा के चुनावी मैदान की हार नहीं है, बल्कि यह परोक्ष रूप से भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के राजनीतिक वजूद के लिए एक बड़ा झटका है। क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ और संगठन की ताकत का दावा करने वाले शुक्ला खेमे के लिए यह परिणाम असहनीय है। हाल ही में प्रदेश में सक्रिय हुए पार्टी नेतृत्व और सांगठनिक दावों के बीच, सत्ताधारी दल के लिए अपने ही गढ़ (तराई) में इस तरह की शिकस्त मिलना इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर जनता की नाराजगी को भांपने में कहीं न कहीं चूक हुई है। बहरहाल किच्छा और सिरौली कलां के इन परिणामों ने यह बता दिया है कि तराई की राजनीति में कागजी दांव-पेच से ज्यादा जमीन पर मजबूत पकड़ और जनता के साथ सीधा जुड़ाव मायने रखता है। फिलहाल, इस मुकाबले में तिलकराज बेहड़ ने बाजी मारकर अपने तेवर साफ कर दिए हैं, लेकिन इस हार के बाद राजेश शुक्ला और भाजपा की अगली चाल क्या होगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। 2027 के विधानसभा रण का यह ट्रेलर वाकई बेहद रोमांचक रहा है, और असली पिक्चर अभी बाकी है
2027 के विधानसभा चुनाव का ‘सेमीफाइनल’ और उसके मायने
राजनीतिक विश्लेषक इस निकाय चुनाव को आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान रहे थे, और परिणाम आने के बाद यह साफ हो गया है कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
बेहड़ का बढ़ा कदः इस जीत ने उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर तिलकराज बेहड़ के राजनीतिक रसूख और कद को कई गुना बढ़ा दिया है। आने वाले विधानसभा चुनाव में किच्छा सीट पर कांग्रेस की स्थिति अब और अधिक मजबूत हो गई है।
मनोबल सातवें आसमान परः प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिए यह जीत एक संजीवनी बूटी की तरह है, जो कार्यकर्ताओं में नया जोश भर रही है।
सत्ता पक्ष के लिए वेक-अप कॉलः राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा को अब अपनी रणनीति और स्थानीय समीकरणों पर नए सिरे से काम करना होगा, अन्यथा तराई का यह सियासी समीकरण पार्टी के लिए 2027 में भारी पड़ सकता है।!

