संजय सक्सेना, लखनऊ | वरिष्ठ पत्रकार
कभी मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैठा एक बुजुर्ग पूरे इलाके के बच्चों पर नजर रखता था। किसी बच्चे को गलत करते देखता तो वहीं टोक देता, डांट देता और जरूरत पड़ने पर उसके माता-पिता तक शिकायत पहुंचा देता। खास बात यह थी कि उस दौर में बुजुर्ग की डांट को दखल नहीं, बल्कि बच्चे के प्रति जिम्मेदारी माना जाता था।
आज वही तस्वीर तेजी से बदल गई है। मोहल्लों की जगह ऊंची इमारतों और बंद फ्लैटों ने ले ली है। पड़ोसी को पड़ोसी का नाम तक पता नहीं और निजी जिंदगी में दखल न देने की संस्कृति ने सामाजिक रिश्तों की उस गर्माहट को कमजोर कर दिया है, जिसमें पूरा मोहल्ला एक परिवार की तरह रहता था।
अब बच्चे को टोकना भी पड़ता है भारी
पहले अगर कोई बुजुर्ग किसी बच्चे को सड़क पर गलत करते देख लेता था तो उसे रोकना सामान्य बात थी। आज किसी बच्चे को टोकने से पहले लोग कई बार सोचते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं बच्चे के माता-पिता ही इसे अपने बच्चे की आजादी में दखल न मान लें।
यही बदलाव समाज के लिए चिंता का विषय है। जब बच्चों को सही और गलत का फर्क समझाने वाला परिवार और समाज का दायरा छोटा होता जाएगा, तो उनके व्यवहार और सोच पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है।
गूगल और सोशल मीडिया बने नए गुरु
आज की युवा पीढ़ी के पास जानकारी हासिल करने के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। मोबाइल, इंटरनेट और गूगल ने दुनिया की जानकारी उंगलियों पर ला दी है। लेकिन जानकारी और अनुभव में अंतर है।
बुजुर्गों के वर्षों के जीवन अनुभव को किसी सर्च इंजन से डाउनलोड नहीं किया जा सकता। उनकी एक छोटी-सी सीख कई बार उस गलती से बचा सकती है, जिसे समझने में युवा को वर्षों लग सकते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब नई पीढ़ी हर बात को इंटरनेट पर तलाशना तो चाहती है, लेकिन अपने घर के बुजुर्गों से सलाह लेना पुराना विचार समझने लगती है।
बदलती सामाजिक भाषा भी चिंता का विषय
सार्वजनिक स्थानों, स्कूल-कॉलेजों और विभिन्न आयोजनों में युवाओं के बीच बढ़ती बदजुबानी और असंयमित व्यवहार पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। किसी भी आंदोलन या प्रदर्शन का उद्देश्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, सार्वजनिक मर्यादा और भाषा की गरिमा बनाए रखना समाज की जिम्मेदारी है।
यह केवल युवाओं की समस्या नहीं है। इसके लिए परिवार, स्कूल, समाज और हम सभी को अपनी भूमिका पर विचार करना होगा।
बुजुर्गों की डांट में छिपी थी जिम्मेदारी
बुजुर्गों की डांट हमेशा सजा देने के लिए नहीं होती थी। उसमें अनुभव, चिंता और आने वाली पीढ़ी को सही दिशा देने की भावना छिपी होती थी।
आज जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता और तकनीक को अपनाते हुए हम अपने सामाजिक मूल्यों को पीछे न छोड़ें। बच्चों को स्वतंत्रता जरूर मिले, लेकिन स्वतंत्रता के साथ अनुशासन, जिम्मेदारी और बड़ों के अनुभव का सम्मान भी जरूरी है।
मोहल्ले की संस्कृति को फिर से जीवित करने की जरूरत
राष्ट्र निर्माण सिर्फ बड़ी इमारतों, चौड़ी सड़कों और आर्थिक विकास से नहीं होता। मजबूत समाज के लिए मजबूत परिवार, अच्छे संस्कार और पीढ़ियों के बीच संवाद भी जरूरी है।
हमें ऐसी सामाजिक व्यवस्था की जरूरत है जहां बच्चे बुजुर्गों से डरें नहीं, बल्कि उनका सम्मान करें; और बुजुर्ग बच्चों को टोकने से डरें नहीं, बल्कि उनकी जिम्मेदारी महसूस करें।
संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार के इस विचार लेख का मूल सवाल यही है—क्या आधुनिकता की दौड़ में हमने उस सामाजिक व्यवस्था को पीछे छोड़ दिया, जहां एक बच्चे की चिंता सिर्फ उसके माता-पिता की नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की जिम्मेदारी हुआ करती थी?
USTV Rudrapur: तकनीक हमारी जिंदगी आसान बना सकती है, लेकिन जीवन का अनुभव आज भी रिश्तों, समाज और बुजुर्गों की सीख से ही मिलता है।

