मोदी के जन्मदिन से महीने भर का ‘सेवा संकल्प’, लेकिन उत्तराखंड में इसके मायने सिर्फ आयोजन तक सीमित नहीं
लाभार्थी से युवा तक सीधा संवाद, सरकार की उपलब्धियों को जनकथा बनाने की तैयारी- चुनाव से पहले संगठन को भी मिलेगी जमीनी फीडबैक की खुराक
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन से शुरू हुआ महीने भर का ‘सेवा संकल्प अभियान’ उत्तराखंड में जितना सामाजिक और सरकारी कार्यक्रम है, उतना ही इसके राजनीतिक मायने भी हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव की घड़ी नजदीक आ रही है और ऐसे समय भाजपा ने सेवा, संवाद, जनभागीदारी और लाभार्थियों के अनुभव को एक ही अभियान में पिरोकर समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने की व्यापक कवायद शुरू की है। अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलेगा और सरकार ने इसके तहत 11 प्रमुख कार्यक्रम तय किए हैं।
ऊपरी तौर पर इसका संदेश ‘विकसित भारत-2047’ और जनसेवा है, लेकिन कार्यक्रमों की संरचना बताती है कि भाजपा की नजर उन वर्गों पर भी है जो किसी भी चुनाव की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होते हैंकृयुवा, महिलाएं, विद्यार्थी, सरकारी योजनाओं के लाभार्थी, अभिभावक और सामाजिक संगठन। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य केंद्र और राज्य की योजनाओं से लोगों के जीवन में आए बदलाव की कहानियों को सामने लाना भी है।
यहीं से अभियान का राजनीतिक पक्ष शुरू होता है। सरकार की उपलब्धियां आमतौर पर बजट, योजनाओं और घोषणाओं के आंकड़ों में सामने आती हैं, लेकिन चुनाव में असर उस समय बनता है जब उन्हीं योजनाओं को किसी लाभार्थी के व्यक्तिगत अनुभव से जोड़ा जाता है। ‘सेवा संकल्प’ इसी मॉडल पर सरकार की उपलब्धियों को सरकारी दस्तावेज से निकालकर जनसंवाद का हिस्सा बनाने की कोशिश करता दिखाई देता है।
भाजपा के लिए इसकी दूसरी बड़ी उपयोगिता संगठन को चुनावी मोड में लाने की है। एक महीने तक जिले, ब्लॉक और स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम चलेंगे तो मंत्री, जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता लगातार जनता के बीच रहेंगे। इससे केवल सरकार की बात पहुंचाने का अवसर नहीं मिलेगा, बल्कि पार्टी को यह जानने का मौका भी मिलेगा कि जमीन पर किन मुद्दों को लेकर संतोष है और कहां नाराजगी। चुनाव से पहले इस तरह का फीडबैक किसी भी दल के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता है।
सबसे दिलचस्प फोकस युवा वर्ग पर है। शैक्षणिक संस्थानों से लेकर नवाचार और संवाद तक कई गतिविधियां युवाओं को केंद्र में रखकर तैयार की गई हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विकसित भारत के निर्माण में युवाओं की भागीदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया है। रोजगार, भर्ती और भविष्य की संभावनाओं जैसे सवालों के बीच युवा मतदाता से सीधा संवाद भाजपा के लिए केवल कार्यक्रम नहीं, राजनीतिक आवश्यकता भी माना जा सकता है।
इस अभियान का एक और पक्ष नैरेटिव की लड़ाई है। चुनाव नजदीक आते ही विपक्ष सरकार को रोजगार, विकास, जमीन, कानून-व्यवस्था या अन्य मुद्दों पर घेरेगा, जबकि सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों और कल्याणकारी योजनाओं को सामने रखेगा। ऐसे में भाजपा ‘सेवा संकल्प’ के जरिए चुनावी बहस की शुरुआत विपक्ष के आरोपों से नहीं, अपनी उपलब्धियों और प्रधानमंत्री मोदी के विकास विजन से करना चाहती दिखाई देती है।
यानी यह अभियान केवल मोदी के जन्मदिन का एक महीने लंबा उत्सव नहीं है। इसके भीतर सरकार की उपलब्धियों का प्रचार, लाभार्थियों से जुड़ाव, युवाओं से संवाद, संगठन की सक्रियता और जनता का मूड समझनेकृसभी तत्व मौजूद हैं। हालांकि इसका वास्तविक राजनीतिक असर कार्यक्रमों की संख्या या भीड़ से तय नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि महीने भर की यह कवायद जनता के साथ स्थायी संवाद में बदलती है या आयोजन समाप्त होते ही उसका प्रभाव भी सिमट जाता है।
‘सेवा’ से निकलेगा सियासी फीडबैक
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए यह अभियान एक तरह का जमीनी परीक्षण भी बन सकता है। लाभार्थियों की प्रतिक्रिया, युवाओं के सवाल, स्थानीय समस्याएं और संगठन की सक्रियताकृएक महीने के कार्यक्रमों के दौरान इन सभी का अंदाजा पार्टी को मिलेगा। इसी कारण ‘सेवा संकल्प’ को केवल सरकारी उपलब्धियों के प्रचार के रूप में देखना तस्वीर का आधा हिस्सा होगा- इसका दूसरा हिस्सा 2027 से पहले जनता और संगठन के बीच संपर्क को मजबूत करने की राजनीतिक कोशिश है।

