अब असली परीक्षा जमीन पर
86 साल पुराने सपने को छह राज्यों के समझौते ने दी नई रफ्तार
जल बंटवारे और वित्तीय हिस्सेदारी की बड़ी गांठ खुली
पुनर्वास और 2500 हेक्टेयर वन भूमि बनेगी अगली चुनौती
देहरादून। करीब आठ दशक से कागज, सर्वे, डीपीआर और राज्यों के बीच सहमति की तलाश में घूमती रही किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पहली बार उस मुकाम पर पहुंची है, जहां इसके धरातल पर उतरने की वास्तविक संभावना दिखाई देने लगी है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच हुए समझौते की असली अहमियत केवल इतने भर में नहीं है कि छह मुख्यमंत्रियों ने एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। बड़ा बदलाव यह है कि परियोजना को लंबे समय से रोकने वाली पानी के बंटवारे और वित्तीय जिम्मेदारी की राजनीतिक-अंतरराज्यीय गांठ काफी हद तक खोल दी गई है।
किशाऊ का इतिहास बताता है कि इसकी देरी की वजह सिर्फ सरकारों की इच्छाशक्ति नहीं थी। परियोजना की परिकल्पना 1940 में हुई, 1944-45 में सर्वे शुरू हुआ, फिर काम रुका। 1960 के दशक में इसे दोबारा उठाया गया, लेकिन प्रस्तावित स्थल पर भूगर्भीय फॉल्ट मिलने के बाद बांध की डिजाइन और स्थल दोनों पर बार-बार पुनर्विचार करना पड़ा। 1970 और 1980 के दशक में भी वैकल्पिक स्थलों और तकनीकी स्वरूप पर अध्ययन चलता रहा। यानी किशाऊ की यात्र राजनीतिक सहमति के साथ भूगर्भीय और इंजीनियरिंग चुनौतियों की भी कहानी रही है।
इस परियोजना को लंबे समय तक सबसे अधिक उलझाने वाला सवाल थाकृपानी किसे कितना मिलेगा और खर्च कौन उठाएगा। जून में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली बैठक में इस पर सहमति बनी कि जल घटक की लगभग 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार वहन करेगी और शेष 10 प्रतिशत सहभागी राज्य साझा करेंगे। हिमाचल के हिस्से के पानी और विद्युत घटक की लागत को लेकर भी अलग व्यवस्था पर सहमति बनी। सितंबर में छह राज्यों के औपचारिक समझौते ने उसी सहमति को आगे बढ़ाया।
यही इस एमओयू का सबसे बड़ा अर्थ है। कोई भी अंतरराज्यीय नदी परियोजना केवल बांध बनाने का इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं होती- उससे जुड़ा हर घनमीटर पानी और हर रुपये की लागत अलग-अलग राज्यों के हितों से जुड़ी होती है। किशाऊ में पहली बार इन हितों के बीच ऐसा साझा फार्मूला सामने आया है, जिस पर सभी छह पक्षों ने हस्ताक्षर किए हैं।
वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार टोंस नदी पर उत्तराखंड-हिमाचल सीमा के करीब 232-6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी बांध बनेगा। इससे करीब 1562 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी संग्रहित किया जा सकेगा। परियोजना लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई में मदद करेगी और वर्तमान स्वरूप में 422 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता प्रस्तावित है। आधिकारिक अनुमान 1476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का है।
इसका प्रभाव केवल उत्तराखंड और हिमाचल तक सीमित नहीं होगा। अपर यमुना बेसिन के उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को भी जल उपलब्धता से लाभ मिलेगा। केंद्र सरकार के अनुसार दिल्ली इसका प्रमुख लाभार्थी होगी और परियोजना से यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ाने में भी मदद मिलने की अपेक्षा है।
यानी किशाऊ को केवल बिजली परियोजना मानना इसके आकार को कम करके देखना होगा। यह एक साथ जल भंडारण, सिंचाई, पेयजल, ऊर्जा और नदी के पर्यावरणीय प्रवाह से जुड़ी परियोजना है।
यहीं इस समझौते को लेकर सबसे जरूरी सावधानी भी है। एमओयू ने राजनीतिक और वित्तीय रास्ता जरूर आसान किया है, लेकिन परियोजना अभी निर्माण शुरू होने की अवस्था तक नहीं पहुंची है। जून की आधिकारिक घोषणा में स्पष्ट था कि समझौते के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए आगे बढ़ाया जाना है। इसके बाद भी विस्तृत तकनीकी, वन एवं पर्यावरणीय प्रक्रियाएं और जमीनी क्रियान्वयन बाकी रहेंगे।
परियोजना का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और वन क्षेत्र में आएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं स्वीकार किया है कि इसके लिए करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता होगी। इतनी बड़ी वन भूमि के बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भूमि जुटाना उत्तराखंड जैसे वनाच्छादित पर्वतीय राज्य के लिए आसान नहीं होगा। राज्य ने इसमें केंद्र और अन्य सहभागी राज्यों से सहयोग मांगा है।
दूसरा और इससे भी संवेदनशील पक्ष परियोजना प्रभावित परिवारों का पुनर्वास है। बांध के लाभ नीचे के कई राज्यों तक पहुंचेंगे, लेकिन परियोजना का सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव मुख्य रूप से उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र को झेलना होगा। ऐसे में मुआवजा कितना होगा, विस्थापित परिवारों को कहां बसाया जाएगा, उनकी जमीन और आजीविका का विकल्प क्या होगाकृयही सवाल आगे परियोजना की सामाजिक स्वीकार्यता तय करेंगे। मुख्यमंत्री ने पुनर्वास को प्राथमिकता बताया है।
किशाऊ की सफलता का पैमाना अब बदल गया है
करीब 86 साल से किशाऊ का सबसे बड़ा सवाल थाकृक्या परियोजना पर सभी राज्य सहमत होंगे? सितंबर 2026 के समझौते के बाद यह सवाल काफी हद तक पीछे छूट गया है। अब सवाल बदल गए हैंकृकेंद्रीय मंजूरी कितनी जल्दी मिलेगी, पर्यावरण और वन संबंधी प्रक्रियाएं कितने समय में पूरी होंगी, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मॉडल कितना न्यायसंगत होगा और निर्माण को लागत तथा समय सीमा के भीतर कैसे रखा जाएगा। छह राज्यों की सहमति ने किशाऊ को फाइलों से निकालकर आगे जरूर बढ़ाया है। मगर आठ दशक पुरानी परियोजना की वास्तविक सफलता का फैसला हस्ताक्षर की मेज पर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में जंगल, जमीन, पुनर्वास और बांध निर्माण की जमीन पर होगा।
किशाऊ परियोजना एक नजर में
परिकल्पनाः 1940
नदीः टोंस, यमुना की सहायक नदी
बांध की प्रस्तावित ऊंचाईः 232-6 मीटर
जल भंडारणः करीब 1562 डब्ड
विद्युत क्षमताः 422 मेगावाट
सिंचाई लाभः करीब 97 हजार हेक्टेयर
लाभार्थीः उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली
केंद्र की हिस्सेदारीः परियोजना के वित्तीय भार का लगभग 90 प्रतिशत

