धामी सरकार ने विरोधियों के नेतृत्व परिवर्तन के दावों पर लगाया पूर्ण विराम
अजय चड्डा, देहरादून
उत्तराखंड की राजनीति में वर्षों से एक अघोषित परंपरा और अंधविश्वास की स्थिति बनी हुई थी कि कार्यकाल का अंतिम वर्ष आते-आते सत्ता के शीर्ष पर परिवर्तन लगभग तय मान लिया जाता था। मार्च का महीना आते ही सियासी गलियारों में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो जाना एक दस्तूर बन चुका था। लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस स्थापित धारणा और राजनीतिक अस्थिरता के मिथक को न केवल चुनौती दी, बल्कि उसे पूरी तरह से ध्वस्त कर धामी युग का शंखनाद कर दिया है। नवरात्र के पावन अवसर पर संपन्न हुआ पांच मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह महज एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन का जीवंत प्रमाण है। मुख्यमंत्री धामी ने अपने नेतृत्व में पहली बार भाजपा को प्रदेश में रिपीट करवाकर इतिहास रचा था और अब पांचवें वर्ष की दहलीज पर खड़े होकर मंत्रिमंडल का विस्तार कर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उनकी सरकार पारंपरिक जोड़-तोड़ की राजनीति से ऊपर उठकर आत्मविश्वास और श्परफॉरमेंसश् की राजनीति पर चल रही है। जहां विपक्षी दल और कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे थे कि इतिहास खुद को दोहराएगा और चुनाव से पहले चेहरा बदला जाएगा, वहीं धामी ने अपने सधे हुए राजनीतिक कौशल और केंद्रीय नेतृत्व के अटूट विश्वास के बल पर पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। आज उत्तराखंड की राजनीति में यदि कोई चेहरा स्थिरता, निर्णय क्षमता और भविष्य की दिशा का प्रतीक है, तो वह निस्संदेह पुष्कर सिंह धामी हैं। इस महत्वपूर्ण विस्तार के साथ ही सरकार ने क्षेत्रीय, जातीय और अनुभव के समीकरणों को बहुत ही बारीकी से साधा है। शपथ लेने वाले चेहरों में हरिद्वार से कद्दावर नेता मदन कौशिक, रुड़की से प्रदीप बत्रा, राजपुर रोड से खजान दास, रुद्रप्रयाग से भरत सिंह चौधरी और भीमताल से राम सिंह कैड़ा शामिल हैं। इन नेताओं की अपनी-अपनी क्षेत्रें में मजबूत पकड़ और लंबा विधायी अनुभव न केवल सरकार के कामकाज को गति देगा, बल्कि संगठन के भीतर भी एक नई ऊर्जा का संचार करेगा। मुख्यमंत्री ने इन नए चेहरों का चयन उनके पिछले चार वर्षों के ट्रैक रिकॉर्ड और जनता के बीच उनकी सक्रियता को आधार बनाकर किया है, जो यह दर्शाता है कि अब शासन में केवल काम करने वालों को ही तरजीह दी जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुष्कर सिंह धामी ने न केवल प्रदेश की जनता के बीच अपनी पैठ बनाई है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे शीर्ष नेताओं का भी पूर्ण भरोसा अर्जित किया है। एक युवा मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जिस प्रकार समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और नकल विरोधी कानून जैसे कड़े और ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं, उसने उनकी छवि को एक अस्थाई विकल्प से बदलकर अपरिहार्य नेतृत्व में तब्दील कर दिया है। आज यह स्पष्ट संकेत मिल चुका है कि भाजपा अब उत्तराखंड में किसी नए राजनीतिक प्रयोग के मूड में नहीं है और 2027 का चुनावी रण भी इसी युवा चेहरे के नेतृत्व में लड़ा जाएगा।
धामी मॉडल ने तोड़ी सत्ता परिवर्तन की पुरानी परिपाटी
उत्तराखंड की सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम थी कि यहां की आबोहवा में मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा करना लगभग असंभव है। लेकिन धामी मॉडल ने इस परिपाटी को जड़ से उखाड़ फेंका है। मुख्यमंत्री ने दिखाया है कि वे परिस्थितियों के शिकार होने वाले नेता नहीं, बल्कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल मोड़ने वाले कुशल नेतृत्वकर्ता हैं। इस मंत्रिमंडल विस्तार के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया है कि सरकार में अब केवल क्षेत्रीय संतुलन ही नहीं, बल्कि अनुभव और ऊर्जा का संगम होगा। मदन कौशिक जैसा संगठनात्मक अनुभव और भरत सिंह चौधरी जैसी सांस्कृतिक निष्ठा का समावेश यह बताता है कि आगामी वर्ष विकास और सुशासन के नए कीर्तिमान स्थापित करने वाले होंगे। राज्यपाल लेफ्रिटनेंट जनरल गुरमीत सिंह द्वारा दिलाई गई यह शपथ प्रदेश के लिए विकास के नए द्वार खोलने वाली मानी जा रही है। अब सबकी निगाहें नवनियुक्त मंत्रियों के विभागों के बंटवारे पर टिकी हैं, जिसके बाद विकास की यह नई टीम अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरेगी।

