खतरे से निपटने के लिए निर्णायक और दूरगामी कदम, सिर्फ नियम नहीं, सुरक्षा का बनेगा रोडमैप
उत्तराखण्ड सत्य,देहरादून
हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड अपनी नैसर्गिक सुंदरता के साथ-साथ भूगर्भीय हलचलों का केंद्र भी रहा है। धरती के नीचे लगातार बदल रहे समीकरणों ने इस राज्य को प्राकृतिक आपदाओं, विशेषकर भूकंप के लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में लाकर खड़ा कर दिया है। अब, जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों और आगामी भारतीय मानकों ने पूरे राज्य को भूकंपीय खतरे के सर्वाेच्च स्तर पर चिन्हित किया है, राज्य सरकार ने इस आसन्न खतरे से निपटने के लिए एक निर्णायक और दूरगामी कदम उठाया है। यह कदम है-राज्य में भवन निर्माण के तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदलना। उत्तराखण्ड सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पुराने नियमों से अब भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, इसलिए बिल्डिंग बायलॉज को अधिक सुरक्षित, वैज्ञानिक और पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए एक व्यापक महाअभियान शुरू किया गया है। उत्तराखण्ड की बढ़ती भूकंपीय संवेदनशीलता अब केवल अकादमिक चर्चा का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह नीतिगत बदलाव का मुख्य आधार बन चुकी है। भारतीय मानक के आगामी संस्करण, आएसओ 1893-2025 के अनुसार, पूरा उत्तराखण्ड राज्य अब भूकंप जोन छह के अंतर्गत शामिल माना जा रहा है, जो खतरे का उच्चतम स्तर है। इस बेहद गंभीर वैज्ञानिक चेतावनी ने राज्य के नीति-नियंताओं को झकझोर कर रख दिया है। वर्तमान में राज्य में भवन निर्माण की जो नियमावली लागू है, वह भारतीय मानक ब्यूरो के दो दशक पुराने संस्करण (आईएसओ 1893-2002) पर आधारित है। जाहिर है, 2002 के मानक 2025 के अनुमानित खतरों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं। इस खाई को पाटने और भविष्य की किसी भी बड़ी आपदा से जान-माल की रक्षा करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट निर्देश जारी किए। उनके निर्देशों के अनुपालन में मुख्य सचिव श्री आनंद बर्द्धन ने तत्परता दिखाते हुए वर्तमान बिल्डिंग बायलॉज की गहन समीक्षा और उनमें आमूलचूल संशोधन के लिए एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का मार्ग प्रशस्त किया है। यह केवल नियमों में संशोधन भर नहीं है, बल्कि यह राज्य में सुरक्षित निर्माण की एक नई संस्कृति विकसित करने की दिशा में उठाया गया ठोस कदम है। सुरक्षित उत्तराखण्ड की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए सरकार ने देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को एक मंच पर एकत्रित किया है। इस अति महत्वपूर्ण कार्य के लिए सीएस आईआर-केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के निदेशक प्रो- आर- प्रदीप कुमार की अध्यक्षता में 14 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। समिति के संचालन और समन्वय की जिम्मेदारी यूएलएम एमसी, देहरादून के निदेशक डॉ- शांतनु सरकार को संयोजक के रूप में सौंपी गई है। इस समिति की संरचना यह दर्शाती है कि सरकार इस मुद्दे पर कितनी गंभीर है। इसमें केवल नौकरशाह नहीं, बल्कि वे लोग शामिल हैं जो भूकंप इंजीनियरिंग, वास्तुकला, भू-विज्ञान और शहरी नियोजन के शीर्ष विशेषज्ञ हैं। समिति में भारतीय मानक ब्यूरो, आईआईटी रुड़की, ब्रिडकुल, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग और विभिन्न विकास प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। यह विविधताओं से भरी टीम इस बात को सुनिश्चित करेगी कि नए नियम केवल कागजों पर ही मजबूत न हों, बल्कि वे धरातल पर उतरने योग्य और व्यावहारिक भी हों। इस उच्चस्तरीय समिति का कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक और चुनौतीपूर्ण है। उनका प्राथमिक उद्देश्य राज्य के मौजूदा बायलॉज का पोस्टमार्टम करना है-यानी उनका गहन अध्ययन और विश्लेषण करना, ताकि उनकी कमियों को पहचाना जा सके। इसके बाद, सबसे बड़ी चुनौती होगी उन नियमों को वर्तमान भूकंपीय मानकों (आईएसओ 1893-2025), बदलती जलवायु परिस्थितियों और आधुनिक निर्माण तकनीकों के अनुरूप ढालना।मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने इस पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि उत्तराखण्ड की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यह बदलाव अपरिहार्य हो गया था। उनका कहना है कि सरकार का लक्ष्य भवन बायलॉज को केवल सख्त बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक प्रभावी, व्यावहारिक और आपदा-सुरक्षित बनाना है। यह समिति ऐसे सुझाव देगी जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रें में सुरक्षित निर्माण को बढ़ावा मिले और आपदा के जोिखम को न्यूनतम किया जा सके। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव श्री विनोद कुमार सुमन ने इस कवायद के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार का लक्ष्य केवल तकनीकी नियमों में बदलाव करना नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करना है जहाँ सुरक्षित निर्माण लोगों की आदत बन जाए। संशोधित बिल्डिंग बायलॉज में जिन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें भूकंप-रोधी डिजाइन के कड़े प्रावधान, निर्माण से पहले अनिवार्य भू-तकनीकी जांच (मिट्टðी की जांच), हवा के दबाव (विंड लोड) का आकलन और संरचनात्मक सुरक्षा (स्ट्रक्चरल सेफ्टी) से जुड़े सख्त नियम शामिल होंगे। लेकिन सबसे खास बात यह है कि नए नियमों में पहाड़ की सदियों पुरानी स्थानीय पारंपरिक निर्माण तकनीकों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। इसके विपरीत, समिति यह देखेगी कि कैसे पारंपरिक पहाड़ी निर्माण प्रणालियों, जो अक्सर भूकंप रोधी होती हैं, को वैज्ञानिक रूप से आधुनिक नियमों में समाहित किया जा सकता है। यह आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का एक अनूठा संगम होगा, जो पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूल विकास को भी बढ़ावा देगा। समिति का काम केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं होगा। उन्हें इन संशोधित नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु एक ठोस कार्ययोजना और दिशा-निर्देश भी प्रस्तुत करने होंगे। इतना ही नहीं, नए नियमों को धरातल पर उतारने वाले इंजीनियरों, योजनाकारों और संबंधित विभागों के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के सुझाव देना भी समिति के कार्यक्षेत्र में शामिल है। यह विशेषज्ञ समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (न्ैक्ड।) और आवास विभाग को सौंपेगी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही आवास विभाग बायलॉज में आवश्यक संशोधन और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा। उम्मीद की जा रही है कि नए बिल्डिंग बायलॉज लागू होने से उत्तराखण्ड में बनने वाले भवनों की संरचनात्मक मजबूती कई गुना बढ़ जाएगी।
यह एक ऐसी दूरदर्शी पहल है जो आपदा के दौरान जन-धन की हानि को कम करेगी और राज्य में सुरक्षित व टिकाऊ शहरी विकास को एक नई दिशा प्रदान करेगी। उत्तराखण्ड अब अपनी सुरक्षा की इबारतनए सिरे से लिखने को तैयार है।
14 सदस्यों की समिति गठित, परंपरा, पर्यावरण और प्रशिक्षण पर फोकस
देहरादून। उत्तराखण्ड के भवन निर्माण नियमों में ऐतिहासिक बदलाव की कमान देश के प्रतिष्ठित संस्थान सीएसआईआर-सीबीआरआई, रुड़की के निदेशक प्रो- आर- प्रदीप कुमार के हाथों में है, जो इस 14 सदस्यीय समिति के अध्यक्ष हैं। समिति के कार्यों में समन्वय स्थापित करने के लिए यूएलएमएमसी, देहरादून के निदेशक डॉ- शांतनु सरकार को संयोजक का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है। इस उच्चस्तरीय समिति के कंधों पर उत्तराखण्ड के भविष्य की सुरक्षा का बड़ा दारोमदार है। इनका मुख्य कार्य वर्तमान बिल्डिंग बायलॉज की सूक्ष्म समीक्षा और विश्लेषण करना है। उन्हें राज्य में मौजूद भूकंप, भूस्खलन और अन्य सभी प्रकार के आपदा जोिखमों को ध्यान में रखते हुए संशोधित बायलॉज का एक व्यापक मसौदा तैयार करना है। इस मसौदे में भूकंप-रोधी डिजाइन, नवीनतम निर्माण तकनीकों और संरचनात्मक सुरक्षा के प्रावधानों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा। समिति का एक अनूठा कार्य पारंपरिक पहाड़ी निर्माण शैलियों को वैज्ञानिक मान्यता देते हुए उन्हें आधुनिक नियमों का हिस्सा बनाना है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूल निर्माण के लिए विशेष प्रावधान तैयार करना भी उनकी जिम्मेदारी है। यह समिति केवल नियम नहीं बनाएगी, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन का रास्ता भी दिखाएगी और इंजीनियरों व योजनाकारों के प्रशिक्षण के लिए सुझाव भी देगी। समिति में विभिन्न क्षेत्रें के दिग्गजों को शामिल किया गया है। इनमें सीबीआरआई रुड़की के मुख्य वैज्ञानिक डॉ- अजय चौरसिया और पूर्व मुख्य वैज्ञानिक (शिमला) आर्किटेक्ट श्री एस-के- नेगी शामिल हैं। अकादमिक जगत से आईआईटी रुड़की के वास्तुकला विभाग की प्रो- महुआ मुखर्जी अपने सुझाव देंगी।

