उत्तराखण्ड सत्य,रूद्रपुर
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों गूलरभोज से लेकर दिल्ली तक की हलचल ने यह साफ कर दिया है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर किसी भी प्रकार का आंतरिक जोिखम लेने के मूड में नहीं है। संगठनात्मक सक्रियता के बीच गदरपुर विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडेय की भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से मुलाकात महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि प्रदेश की सियासत में आने वाले बड़े बदलावों और ‘डैमेज कंट्रोल’ की एक गहरी पटकथा प्रतीत होती है। बुधवार को प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्टð का अचानक अरविंद पांडेय के आवास पर पहुंचना और उसके ठीक अगले दिन विधायक का दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मिलना, इस बात की पुष्टि करता है कि पार्टी के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी को बुझाने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने मोर्चा संभाल लिया है। विधायक अरविंद पांडेय पिछले कुछ समय से अपनी ही सरकार और नौकरशाही के िखलाफ जिस तरह मुखर रहे हैं, उसने न केवल विपक्ष को मुद्दा दिया बल्कि शासन की छवि पर भी सवाल खड़े किए। हाल के दिनों में जमीन विवाद से जुड़े मामले में उनके परिजनों पर लगे आरोपों, कैंप कार्यालय को अवैध बताकर दिए गए प्रशासनिक नोटिस और पुलिस की कार्यप्रणाली पर उनके तीखे प्रहारों ने देहरादून से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया था। पांडेय ने न केवल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली पर इशारों- इशारों में तंज कसे, बल्कि अपने ऊपर लगे आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए खुद का और अपने परिवार का ‘नार्काे टेस्ट’ और ‘सीबीआई जांच’ तक की मांग कर डाली थी। सरकार और विधायक के बीच बढ़ता यह तनाव मिशन 2027 की राह में भाजपा के लिए एक बड़ा अवरोध बन सकता था, जिसे समय रहते भांपते हुए संगठन ने सुलह का रास्ता निकाला है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो तराई की राजनीति में अरविंद पांडेय का कद और उनकी जमीनी पकड़ को पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती। यही कारण है कि महेंद्र भट्टð और नितिन नवीन जैसे कद्दावर नेताओं के साथ संवाद के जरिए उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई है कि उनकी बात सुनी जा रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात के बाद विधायक पांडेय के सुरों में आई तब्दीली भी गौर करने वाली है। उन्होंने अब संगठन को एकजुट बताते हुए तीसरी बार भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक उपहार जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया है। यह इस बात का संकेत है कि पार्टी ने उन्हें चुनावी प्रबंधन और स्थानीय समीकरणों को साधने की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका का आश्वासन दिया है, ताकि पिछले कुछ समय से जारी श्असंतोषश् के अध्याय को बंद किया जा सके। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘युद्धविराम’ कितना लंबा िखंचता है। क्या नौकरशाही पर उनके हमले थम जाएंगे या फिर यह केवल चुनाव तक के लिए किया गया एक रणनीतिक समझौता है? फिलहाल, भाजपा नेतृत्व ने अपनी सक्रियता बढ़ाकर यह संदेश दे दिया है कि वह आंतरिक कलह को खत्म कर पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने को तैयार है। अरविंद पांडेय की यह सक्रियता न केवल गदरपुर क्षेत्र बल्कि पूरे तराई क्षेत्र में भाजपा के वोट बैंक को सहेजने की कवायद का हिस्सा है।

