आरोपों की तपिश के बीच अरविंद पांडेय का शक्ति प्रदर्शन
उत्तराखण्ड सत्य,रूद्रपुर
उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों गदरपुर का विधायक आवास केवल एक जन प्रतिनिधि का निवास स्थान नहीं, बल्कि ‘सत्ता के संघर्ष‘, ‘राजनैतिक घेराबंदी’ और ‘शक्ति प्रदर्शन’ का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान विधायक अरविंद पांडेय पर एक के बाद एक लग रहे आरोपों की झड़ी और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण के विरुद्ध जारी किए गए नोटिसों ने तराई की राजनीति में वह भूचाल ला दिया है, जिसकी गूंज अब देहरादून के गलियारों से लेकर दिल्ली के दरबार तक सुनाई दे रही है। विधायक आवास पर हजारों कार्यकर्ताओं का उमड़ता सैलाब और प्रदेश स्तर के दिग्गज नेताओं के प्रस्तावित दौरों का ऐन वक्त पर रद्द होना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ी राजनैतिक बिसात बिछाई जा रही है। बीते कुछ दिनों से गदरपुर का राजनैतिक पारा उस समय अपने चरम पर पहुँच गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, वर्तमान सांसद अनिल बलूनी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक जैसे भाजपा के कद्दावर नेताओं के आगमन की सूचना सार्वजनिक हुई। सुबह से ही हजारों की संख्या में कार्यकर्ताओं का जुटना और समर्थकों के चेहरों पर झलकता आक्रोश यह बताने के लिए काफी था कि अरविंद पांडेय के पास आज भी वह ‘जनाधार’ मौजूद है, जो किसी भी दबाव को चुनौती देने का माद्दा रखता है। हालांकि, दोपहर होते-होते जब इन दिग्गजों का कार्यक्रम अचानक रद्द कर दिया गया, तो राजनैतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। अरविंद पांडेय ने इसे अपना ‘व्यक्तिगत आग्रह’ बताते हुए कार्यकर्ताओं को शांत करने की कोशिश की और कहा कि उन्होंने स्वयं वरिष्ठ नेताओं को आने से मना किया है ताकि वर्तमान परिस्थितियों में कोई गलत राजनैतिक संदेश न जाए। लेकिन राजनैतिक पंडित इसे दूसरी नजर से देख रहे हैंकृक्या यह पांडेय द्वारा अपनी ही सरकार के विरुद्ध एक मौन लामबंदी की कोशिश थी जिसे संगठन के हस्तक्षेप के बाद टाला गया? विधायक अरविंद पांडेय का यह सार्वजनिक दावा कि प्रदेश नेतृत्व सहित करीब 30 विधायक उनसे मिलने और समर्थन जताने की इच्छा रखते हैं, भाजपा के भीतर एक बड़े आंतरिक असंतोष की ओर इशारा करता है। अतिक्रमण के मुद्दे पर जिस तरह प्रशासन ने अपनी सख्ती दिखाई है, उसने न केवल पांडेय बल्कि कई अन्य जन प्रतिनिधियों के भीतर भी असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। पांडेय का यह कहना कि ‘राजनीति में हर घटनाक्रम के अलग मायने निकाले जाते हैं‘, इस बात की पुष्टि करता है कि वे फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं और अपनी ताकत का अहसास नेतृत्व को करा चुके हैं। वहीं बाजपुर में दर्ज मुकदमे पर उनकी प्रतिक्रिया ने उनकी ‘फाइटर’ छवि को और पुख्ता किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पुलिस और प्रशासन को यह चुनौती दे डाली कि यदि उनके परिवार ने गलत किया है तो कार्रवाई हो, अन्यथा झूठा मामला दर्ज कराने वाले वादी के विरुद्ध वैधानिक गाज गिरनी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम के बीच वन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता सुरेश परिहार का विधायक आवास पहुंचना डैमेज कंट्रोल की एक गंभीर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। परिहार ने जिस तरह इस पूरे प्रकरण को ‘परिवार का आंतरिक विषय’ करार दिया, वह यह दर्शाता है कि भाजपा का एक बड़ा धड़ा इस विवाद को सड़कों पर आने से रोकना चाहता है। परिहार की यह स्वीकारोक्ति कि ष्ऐसी घटनाओं से पार्टी की छवि और विकास कार्य दोनों प्रभावित होते हैंष्, इस बात का प्रमाण है कि गदरपुर का यह विवाद अब अरविंद पांडेय का व्यक्तिगत मामला न रहकर संगठन की साख का सवाल बन गया है। तराई की इस जटिल राजनीति में वरिष्ठ नेताओं और मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की मांग यह बताती है कि भीतर ही भीतर चिंगारी सुलग रही है। अब देखना यह होगा कि गदरपुर का यह राजनैतिक लावा शांत होता है या फिर आने वाले दिनों में किसी बड़े शक्ति-परिवर्तन का आधार बनता है।

