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    Home » धामी की तैयारी कांग्रेस पर पड़ेगी भारी !
    उत्तराखंड

    धामी की तैयारी कांग्रेस पर पड़ेगी भारी !

    उत्तराखंड सत्यBy उत्तराखंड सत्यDecember 20, 2025No Comments6 Mins Read
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    जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम के साथ मिशन 2027 पर निशाना

    अजय चड्डा,रूद्रपुर

    एक ओर जहां कांग्रेस अंतरकलह से जूझ रही है वहीं भाजपा ने धरातल पर मिशन 2027 की तैयारी तेज कर दी है।धामी सरकार ने एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि वह केवल सचिवालय तक सीमित शासन में विश्वास नहीं रखती, बल्कि सत्ता को जनता के द्वार तक ले जाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रदेश के सभी कैबिनेट मंत्रियों को अगले 45 दिनों तक अलग-अलग जिलों में कैंप करने का आदेश दिया गया है। इस पहल को जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ नाम दिया गया है, जो प्रशासनिक दृष्टि से जितनी अहम है, राजनीतिक दृष्टि से उतनी ही दूरगामी मानी जा रही है। हालांकि सरकार इसे जनता से सीधे संवाद और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का माध्यम बता रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह पहल 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक बुनियाद भी मानी जा रही है। चुनाव से लगभग एक साल पहले मंत्रियों को जमीनी स्तर पर सक्रिय करना यह दर्शाता है कि सरकार अब नीतियों के साथ-साथ जनसंपर्क को भी प्राथमिकता दे रही है। सरकार की ओर से जारी आदेश के अनुसार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज को हरिद्वार और टिहरी जनपद की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि गणेश जोशी उधम सिंह नगर और उत्तरकाशी में सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतारने का कार्य करेंगे। स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत अल्मोड़ा और चमोली में कैंप लगाकर योजनाओं की समीक्षा करेंगे। वन मंत्री सुबोध उनियाल को देहरादून और पौड़ी की जिम्मेदारी दी गई है। महिला एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य नैनीताल, चंपावत और पिथौरागढ़ में अभियान को आगे बढ़ाएंगी, जबकि कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा रुद्रप्रयाग और बागेश्वर में सरकार का संदेश लेकर पहुंचेंगे। यह पहली बार नहीं है जब धामी सरकार ने इस तरह की सक्रिय प्रशासनिक रणनीति अपनाई हो। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने बीते वर्षों में कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जिन्होंने प्रदेश की राजनीति और प्रशासन दोनों को दिशा दी है। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने की दिशा में ठोस पहल, नकल विरोधी कानून, सख्त भू-कानून, धर्मांतरण के खिलाफ कार्रवाई और लैंड जिहाद के मामलों पर सख्ती जैसे फैसलों ने सरकार को एक निर्णायक नेतृत्व वाली सरकार के रूप में स्थापित किया है। इसके साथ ही सड़क, हवाई और रेल कनेक्टिविटी के विस्तार, चारधाम ऑल वेदर रोड, केदारनाथ-बदरीनाथ मास्टर प्लान, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना और सीमांत क्षेत्रें में बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर भी धामी सरकार ने केंद्र के सहयोग से उल्लेखनीय कार्य किए हैं। रोजगार सृजन, स्वरोजगार योजनाएं, महिला स्वयं सहायता समूहों को मजबूती और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट भी सरकार की उपलब्धियों में शामिल हैं। इन उपलब्धियों के बावजूद सरकार को यह भी एहसास है कि योजनाओं की सफलता तभी मानी जाती है, जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। कई बार यह आरोप लगता रहा है कि कई मंत्री अपने विधानसभा क्षेत्रें तक ही सीमित रहते हैं और दूरस्थ जिलों में उनकी उपस्थिति कम रहती है। इसी आलोचना को ध्यान में रखते हुए अब मंत्रियों को सीधे जिलों में भेजा जा रहा है, ताकि वे न केवल योजनाओं का प्रचार करें, बल्कि जमीनी हकीकत को भी समझ सकें। आगामी 45 दिनों के दौरान मंत्री अपने आवंटित जिलों में कैंप करेंगे, जनता की समस्याएं सुनेंगे और योजनाओं से वंचित पात्र लोगों को लाभ दिलाने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देंगे। यह अभियान सरकार के लिए एक तरह का फील्ड टेस्ट भी होगा, जिसमें यह परखा जाएगा कि सरकारी मशीनरी वास्तव में कितनी संवेदनशील और प्रभावी है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह अभियान धामी सरकार के लिए जनता के बीच भरोसे को मजबूत करने का प्रयास है। 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद मुख्यमंत्री धामी ने खुद को एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया है। अब 2027 की ओर बढ़ते हुए यह जरूरी हो गया है कि सरकार अपनी उपलब्धियों को केवल कागजों तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें जनता के अनुभव का हिस्सा बनाए। यह अभियान इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि मंत्री वास्तव में जनता के बीच रहकर समस्याओं का समाधान करते हैं और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है, तो यह न केवल प्रशासनिक सफलता होगी, बल्कि राजनीतिक रूप से भी सरकार को मजबूत आधार प्रदान करेगी। कुल मिलाकर, धामी सरकार की यह पहल सुशासन और चुनावी तैयारी दोनों का मिश्रण कही जा सकती है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि यह अभियान केवल एक प्रशासनिक कवायद बनकर रह जाता है या फिर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार और जनता के बीच भरोसे की नई इबारत लिखता है।

    कैबिनेट को मैदान में उतारना धामी का बड़ा दांव
    देहरादून। धामी सरकार के जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान को यदि केवल प्रशासनिक पहल मानकर देखा जाए तो इसकी राजनीतिक गहराई को समझना मुश्किल होगा। दरअसल, कैबिनेट मंत्रियों को जिलों में उतारने का यह फैसला विपक्ष खासकर कांग्रेस के लिए नई चुनौती बनकर उभर सकता है। लंबे समय से सरकार को जनसंपर्क में कमजोर बताने वाली कांग्रेस अब खुद सवालों के घेरे में नजर आ रही है कि वह जनता के बीच किस एजेंडे और किस रणनीति के साथ उतरेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धामी सरकार ने इस अभियान के जरिए विपक्ष के संभावित मुद्दों की धार को पहले ही कुंद करने की कोशिश की है। मंत्री यदि गांव-गांव और दूरस्थ इलाकों तक पहुंचकर समस्याओं का समाधान करते दिखे, तो कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए सीमित विकल्प ही बचेंगे। खासतौर पर पर्वतीय जिलों में, जहां अक्सर उपेक्षा के आरोप लगत रहे हैं, वहां मंत्रियों की मौजूदगी सरकार के पक्ष में माहौल बना सकती है। कांग्रेस फिलहाल संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व के आंतरिक संतुलन में उलझी दिखाई देती है। ऐसे में सत्ताधारी दल का पूरा मंत्रिमंडल मैदान में उतरना विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाएगा। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह अभियान कांग्रेस के लिए फ्एिक्टिव पॉलिटिक्स’ की स्थिति पैदा कर सकता है, जहां उसे सरकार की हर पहल पर केवल प्रतिक्रिया देनी पड़े, न कि अपना अलग एजेंडा तय करने का मौका मिले।

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