तराई के कद्दावर कांग्रेस नेता बेहड़ ने पेश की नैतिकता की वह नजीर, जो सियासत में दुर्लभ है
अजय चड्डा,रूद्रपुर
तराई की राजनीति में दशकों तक अपनी धाक जमाने वाले, शेर जैसी दहाड़ रखने वाले किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ की आँखों में जब आँसू छलक आए, तो मानो समय ठहर गया। यह आँसू किसी राजनैतिक हार के नहीं थे, न ही ये किसी बाहरी शत्रु के प्रहार का परिणाम थे, ये आँसू थे एक पिता के विश्वास के टूटने के। अपने ही लहू द्वारा रचे गए छल ने एक ऐसे कद्दावर नेता को सार्वजनिक रूप से रुंधे गले से जनता के सामने हाथ जोड़कर माफी मांगने पर मजबूर कर दिया, जिसने हमेशा दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनसेवा का संकल्प निभाया। रुद्रपुर के इस पूरे प्रकरण ने समाज के सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है-क्या एक पुत्र की महत्वाकांक्षा या कुंठा किसी पिता की जीवनभर की कमाई ‘प्रतिष्ठा’ से बड़ी हो सकती है? इस समूचे घटनाक्रम को यदि हम संवेदना के चश्मे से देखें, तो शुरुआत में यह किसी के लिए भी बनावटी नहीं था। जब पार्षद सौरभ राज बेहड़ घायल अवस्था में अस्पताल पहुंचे, तो हर पिता की तरह तिलक राज बेहड़ का खून भी खौला था। उस समय का आक्रोश, वह चेतावनी और अस्पताल में उमड़ा पक्ष-विपक्ष का जमावड़ा, उस पिता के प्रति सहानुभूति थी जिसने तराई की सेवा में अपना जीवन खपा दिया। लेकिन जैसे ही पुलिस ने इस ‘खेल’ के पीछे की कड़वी सच्चाई कि बेटे ने खुद ही सहानुभूति बटोरने के लिए यह षडड्ढंत्र रचा था को बेनकाब किया, तो मंजर पूरी तरह बदल गया। उस क्षण वहाँ एक नेता नहीं, बल्कि एक पिता अपने ही बेटे की करतूत के आगे हार गया था। पर यहीं से शुरू होता है तिलक राज बेहड़ का वह ‘नैतिक महानायकत्व’, जो उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है। आज के दौर की राजनीति में जहाँ अपने रसूखदार बच्चों के जघन्य अपराधों-चाहे वह हत्या हो, दुष्कर्म हो या भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए राजनेता पूरी सरकारी मशीनरी और ताकत झोंक देते हैं, वहां बेहड़ ने एक ऐसी लकीर खींच दी है जिसे पार करना हर किसी के बस की बात नहीं। उन्होंने न केवल सार्वजनिक रूप से बेटे की गलती को स्वीकारा, बल्कि भरे मन से यह भी कह डाला कि ‘मैं इसे अपना नहीं सकता, इसने मेरी छवि को धूल धूसरित किया है।’ अपने ही बेटे से तमाम संबंध तोड़ने का ऐलान करना और उसे अपनी बर्बादी का जिम्मेदार ठहराना, किसी भी पिता के लिए कलेजे पर पत्थर रखने जैसा है। बेहड़ का यह साहस उन तमाम पिताओं के लिए एक नजीर है जो अपने बच्चों के अपराधों पर पर्दा डालकर उन्हें और बड़ा अपराधी बना देते हैं। तराई की मिट्टðी ने कई राजनैतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन एक कद्दावर नेता का अपनी साख को बचाने के लिए अपने ही पुत्र का मोह त्याग देना, इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा। बेहड़ ने स्पष्ट कर दिया कि जिस जनता ने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुँचाया है, उसके प्रति उनकी जवाबदेही उनके पुत्र मोह से कहीं बढ़कर है। सार्वजनिक जीवन में शुचिता का यह उदाहरण उन राजनेताओं के लिए एक आईना है जो ‘पुत्र-मोह’ में धृतराष्ट्र बन जाते हैं। बेहड़ की यह शर्मिंदगी दरअसल उनकी ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर उभरी है। आज भले ही उनका सिर झुका हो, लेकिन उनके इस नैतिक साहस ने उन्हें लोगों की नजरों में और भी ऊंचा उठा दिया है। यह जिगरा, यह ईमानदारी और यह नैतिक बल ही है जो आज की ‘पोषित राजनीति’ में तिलक राज बेहड़ को एक अलग पहचान देता है।
‘पुत्र-मोह’ के धृतराष्ट्र काल में एक ‘भीष्म’ प्रतिज्ञा
रुद्रपुर। शहर में घटी यह घटना समाज के लिए एक गंभीर केस स्टडी है। अक्सर देखा गया है कि जब किसी राजनेता का परिजन किसी अपराध में फंसता है, तो पूरा तंत्र उसे ‘क्लीन चिट’ दिलाने में जुट जाता है। कई उदाहरण ऐसे हैं जहाँ हत्या और छेड़छाड़ जैसे संगीन मामलों में भी सफेदपोश संरक्षक बनकर खड़े रहे। लेकिन तिलक राज बेहड़ ने जिस तरह पक्ष और विपक्ष, दोनों का आभार व्यक्त करते हुए अपने बेटे के कृत्य की निंदा की, वह राजनैतिक शिष्टाचार की पराकाष्ठा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस व्यक्ति ने तराई की एक आवाज पर हजारों लोगों को एकत्रित करने का माद्दा रखा, आज उसी के बेटे ने उसे लोगों की नजरों में गिरा दिया। दिल पर पत्थर रखकर लिया गया उनका यह कठिन फैसला उन पिताओं के लिए एक चेतावनी भी है और सबक भी, जो अपने बच्चों की हर जायज-नाजायज मांग और हरकत को अपनी सत्ता के जोर पर पालते-पोसते हैं। सार्वजनिक माफी मांगने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है, उसकी राजनेताओं में भारी कमी है, लेकिन बेहड़ ने अपनी आंखों के पानी से नैतिकता की जो नई इबादत लिखी है, वह आने वाले कई सालों तक तराई की राजनीति में मिसाल के तौर पर याद रखी जाएगी। यह एक पिता की हार
नहीं, बल्कि एक सत्यनिष्ठ राजनेता की सबसे बड़ी वैचारिक जीत है।

