क्या छंटेगा साजिशों का कोहरा?, अपनों को नसीहत विरोधियों को चुनौती
उत्तराखण्ड सत्य, देहरादून
उत्तराखंड की राजनीति में जब भी अंकिता भंडारी का नाम गूंजता है, सत्ता के गलियारों में हलचल तेज होना स्वाभाविक है। लेकिन हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिस अंदाज में मीडिया का सामना किया, उसने राज्य की सियासी फिजां में एक नया विमर्श पैदा कर दिया है। सचिवालय के भीतर आयोजित प्रेस कॉन्फ्ेंस का आधिकारिक एजेंडा भले ही ‘टठ ळ त्।ड ळ’ योजना की जानकारी देना था, लेकिन मुख्यमंत्री के तेवरों ने इसे पूरी तरह से अंकिता हत्याकांड पर सरकार की सफाई और पलटवार के मंच में तब्दील कर दिया। जैसे ही पत्रकारों ने अंकिता मामले की सुगबुगाहट की, मुख्यमंत्री ने महज 14 मिनट में सरकारी योजनाओं का औपचारिक पाठ समाप्त किया और अगले 22 मिनट तक उन सवालों से दो-दो हाथ किए, जो लंबे समय से सरकार की घेराबंदी कर रहे थे। मुख्यमंत्री धामी ने इस दौरान न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह अपना पक्ष रखा, बल्कि अपनी छवि को एक ऐसे अभिभावक के रूप में पेश किया जो अपनी ‘बेटी’ के लिए न्याय की लड़ाई में किसी भी हद तक जाने को तैयार है। उन्होंने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया कि जघन्य अपराध के तुरंत बाद कड़ी कार्रवाई करने के बावजूद, कुछ तत्व राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए बार-बार सरकार और संगठन पर उंगलियां उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में चुनौती देते हुए कहा कि वह हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं और उन्होंने पूरे घटनाक्रम को एक बार फिर जनता की याददाश्त में ताजा किया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार ने शुरू से ही इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई है।प्रेस कॉन्फ्ेंस का सबसे चर्चित पहलू वह वायरल ऑडियो क्लिप रहा, जिसने हाल के दिनों में राज्य में भारी शोर मचाया है। इस पर मुख्यमंत्री का रुख बेहद तल्ख और स्पष्ट था। उन्होंने इस ऑडियो क्लिप को एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा बताते हुए कहा कि जिस तरह से इसमें कभी हत्या तो कभी आत्महत्या की बातें की जा रही हैं, वह केवल जांच को भटकाने और जनता के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश है। धामी ने सार्वजनिक मंच से उन सभी लोगों को ललकारा जो इस ऑडियो के आधार पर माहौल खराब कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास भी इस मामले में रत्ती भर भी सत्यता है या कोई ठोस सबूत है, तो वह बेझिझक जांच एजेंसियों के पास आए। उन्होंने गवाहों की सुरक्षा और उनके नाम की गोपनीयता का भरोसा दिलाते हुए यह साफ किया कि केवल हवा में तीर चलाने से न्याय नहीं मिलता, बल्कि सबूतों से मिलता है।मुख्यमंत्री का रुख अपनों के प्रति भी उतना ही सख्त दिखा जितना विरोधियों के प्रति। पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर और उर्मिला सनावर का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सम्मानित नागरिक और पूर्व जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें जांच में सहयोग करना चाहिए। उन्होंने तंजिया लहजे में कहा कि जब पुलिस रोज नोटिस लेकर घर पहुंच रही है, तो छिपने के बजाय सामने आकर अपनी बात रखनी चाहिए, अन्यथा कानून अपना काम करने में सक्षम है। यह संदेश उन लोगों के लिए भी था जो इस संवेदनशील मामले में पर्दे के पीछे से राजनीति कर रहे हैं।अंत में मुख्यमंत्री ने अपने विरोधियों और राज्य की जनता को एक शायराना लेकिन गहरे संदेश के साथ आश्वस्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि जिस तरह से पूर्व में पेपर लीक जैसे मामलों में भ्रम फैलाया गया था और अंत में सत्य की जीत हुई थी, वैसे ही अंकिता मामले में भी सच की विजय होगी। उनका यह कहना कि ष्बादल हटेंगे, कोहरा हटेगा और एक बार फिर सूरज निकलेगाष्, इस बात का प्रतीक है कि सरकार इस मुद्दे पर खुद को पूरी तरह दोषमुक्त और पारदर्शी मानती है। यह रिपोर्ट केवल एक प्रेस कॉन्फ्ेंस का ब्यौरा नहीं है, बल्कि यह मुख्य मंत्री धामी के उस राजनीतिक आत्म विश्वास का दस्तावेज है, जिसके जरिए वे राज्य में फैले अनिश्चितता के कोहरे को चीरकर न्याय का सूरजनिकालने का दावा कर रहे हैं।
इंसाफ की चौखट पर ‘सियासी सुलगते’ सवाल
अंकिता भंडारी प्रकरण अब केवल एक पुलिसिया तफ्तीश भर नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की सियासत और सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। एक तरफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह दावा है कि सरकार ने घटना के पहले दिन से ही ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई और तत्काल गिरफ्तारियां कीं, तो दूसरी तरफ विरोधियों का यह तर्क है कि जांच की परतें अभी भी उस ‘अदृश्य वीआईपी’ तक नहीं पहुंच पाई हैं, जिसका जिक्र शुरुआती शोर में बार-बार हुआ था। मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्ेंस में सुरेश राठौर जैसे रसूखदार नामों को सीधे तौर पर पुलिस के सामने आने की नसीहत देना यह तो दर्शाता है कि सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह महज एक राजनीतिक दांव है या फिर जांच का कोई नया सिरा? राज्य की जनता के लिए अंकिता केवल एक नाम नहीं, बल्कि पहाड़ की अस्मिता का प्रतीक बन चुकी है। ऐसे में, वायरल ऑडियो क्लिप और उस पर मचे बवाल के बीच, सच और झूठ की इस जंग ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को भी कसौटी पर खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री का ‘सूरज निकलने’ वाला भरोसा तभी सार्थक होगा, जब इंसाफ की रोशनी अंकिता के बिलखते माता-पिता के आंगन तक पहुंचेगी और अफवाहों के इस शोर का कानूनी अंत होगा।

