प्रशासनिक सच्चाई जिस पर कैबिनेट ने ध्यान दिया
अजय चड्डा,रूद्रपुर
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने छोटे अपराधों को लेकर राज्य की दंड व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा में पहला बड़ा कदम उठा दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में जन विश्वास अधिनियम के अध्यादेश को मंजूरी दे दी गई है। अधिनियम अभी लागू नहीं हुआ है, लेकिन कैबिनेट की हरी झंडी के बाद अब इसके औपचारिक रूप से अध्यादेश बनने और फिर अधिनियम के लागू होने की प्रक्रिया शुरू होगी। इस प्रस्तावित अधिनियम के तहत सात अलग-अलग विभागों के कानूनों में लंबे समय से मौजूद छोटी अवधि के कारावास प्रावधानों को हटाकर भारी आर्थिक दंड लगाने का निर्णय लिया गया है। कुछ मामलों में यह जुर्माना पाँच गुना तक बढ़ सकता है। सरकार का मानना है कि तीन से छह महीने की जेल का प्रावधान रखने वाले उल्लंघनों में लोग व्यवहारिक रूप से कभी जेल नहीं जाते, क्योंकि अदालतें इन्हें हल्के अपराध मानकर तत्काल जमानत दे देती हैं। ऐसे में कारावास का प्रावधान सिर्फ कागजों में काम करता है, जबकि प्रभावी दंड के रूप में जुर्माना अधिक कारगर साबित हो सकता है। केन्द्र सरकार पहले ही राज्यों को ऐसे सभी कानूनों को संशोधित करने के निर्देश दे चुकी है जिनमें छोटे उल्लंघनों पर भी जेल के प्रावधान बने हुए हैं। उत्तराखंड ने इस दिशा में तेजी दिखाते हुए सात कानूनों को एक संयुक्त और सरल ढाँचे-जन विश्वास अधिनियम के तहत समायोजित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह राज्य में दंड प्रणाली के ‘अपराधीकरण की अति’ को कम करने की एक कोशिश मानी जा रही है। हालाँकि जहाँ छोटे अपराधों में नरमी बरती गई है, वहीं पर्यावरणीय अपराधों को इससे अलग रखा गया है। उत्तराखंड नदी घाटी विकास एवं प्रबंधन अधिनियम, 2005 में पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए अब पहले से कहीं अधिक कठोर दंड का प्रस्ताव है। गंभीर मामलों में दो महीने तक कारावास के साथ 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है, और अपराध की प्रकृति के अनुसार दोनों सजाएँ एक साथ भी लागू की जा सकती हैं। प्रदेश की संवेदनशील पारिस्थितिकी को देखते हुए यह संकेत स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों से िखलवाड़ पर सरकार किसी प्रकार की नरमी नहीं चाहती। इस अध्यादेश के तहत किए गए संशोधन अन्य कानूनों में भी स्पष्ट नजर आते हैं। जैविक कृषि अधिनियम में प्रतिबंधित रासायनिक सामग्री बेचने पर पहले एक साल की जेल का प्रावधान था, जिसे हटाकर अब जुर्माना 50 हजार से पाँच लाख रुपये तक बढ़ाने का प्रस्ताव है। प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, फल नर्सरी विनियमन, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के आरक्षण नियम, बाढ़ मैदान जोनिंग और झुग्गी विनियमन जैसे कानूनों में भी कारावास या तो घटाया गया है या हटाया गया है, और उनकी जगह आर्थिक दंड को प्राथमिकता दी गई है। एक महत्वपूर्ण नए प्रावधान के अनुसार हर तीन साल में सभी जुर्मानों की राशि में स्वतः दस प्रतिशत वृद्धि होगी ताकि समय के साथ दंड का प्रभाव कम न पड़े और अनुपालन प्रणाली लगातार मजबूत बनी रहे।
क्या यह परिवर्तन सही दिशा में कदम होगा?
कैबिनेट की मंजूरी के साथ जन विश्वास अधिनियम अब औपचारिक प्रक्रिया की ओर बढ़ चुका है। इसके लागू होने के बाद राज्य की दंड प्रणाली में बड़े बदलाव नजर आएँगे जहाँ छोटे अपराधों में अनावश्यक कारावास समाप्त होगा, वहीं पर्यावरणीय अपराधों में कड़ाई पहले से ज्यादा होगी। हालाँकि यह भी देखने वाला पहलू है कि बढ़े हुए आर्थिक दंड कहीं भ्रष्टाचार या मनमानी की नई गुंजाइश न खोल दें। साथ ही, यह भी चुनौती होगी कि दंड का बोझ कमजोर वर्गों और छोटे व्यवसायों पर कितना पड़ेगा। फिर भी, यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड एक ऐसी दंड प्रणाली की ओर बढ़ रहा है जो जेल के बजाय जवाबदेही और आर्थिक प्रतिबंधों पर आधारित होगी। कैबिनेट ने जिस सुधार यात्रा की शुरुआत की है, उसका वास्तविक असर तभी सामने आएगा जब यह अधिनियम लागू होगा और तब साफ होगा कि बदली हुई दंड व्यवस्था कितना जन-विश्वास अर्जित कर पाती है।
प्रशासनिक सच्चाई जिस पर कैबिनेट ने ध्यान दिया
राज्य के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि जिन अपराधों में सात साल से कम कारावास का प्रावधान होता है, उनमें अपराधियों को वास्तव में जेल भेजना दुर्लभ है। अदालतें ऐसे मामलों में तुरंत जमानत दे देती हैं, और व्यावहारिक रूप से केवल आर्थिक दंड ही लागू होता है। ऐसे में कानून में लिखी जेल की सजा केवल औपचारिकता रह जाती है। कैबिनेट की मंजूरी उसी वास्तविकता को स्वीकार करते हुए दंड प्रणाली को अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में दी गई है।

