वाराणसी। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट को केवल एक श्मशान नहीं, बल्कि मोक्ष की अंतिम चौखट माना जाता है। यहाँ हर दिन दर्जनों चिताएँ जलती हैं, हजारों लोग अंतिम यात्रा पर आते हैं और करोड़ों लोगों की आस्था निर्वाण से जुड़ती है। लेकिन इस पावन स्थल की एक परंपरा ऐसी है, जो अधिकतर लोगों की नज़र से ओझल रहती है। जब चिता शांत हो जाती है और मुखाग्नि देने की प्रक्रिया पूर्ण होती है, तो उस स्थान पर भस्म के ऊपर “94” अंक लिखा जाता है।
यह संख्या केवल एक रिवाज नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक रहस्य और सनातन दर्शन की परिचायक है। दिलचस्प बात यह है कि इस परंपरा के बारे में हर कोई नहीं जानता। केवल खांटी बनारसी लोग, घाट के कर्मकांडी परिवार और आसपास के निवासी ही इसके सही अर्थ को समझते हैं। बाहर से आने वाले शवदाह करने वाले या परिजन अक्सर इस अंक की भावना और महत्व से अनभिज्ञ रहते हैं।
क्यों लिखा जाता है 94?
सनातन मान्यता के अनुसार मनुष्य के जीवन में 100 शुभ कर्म माने गए हैं। इनसे उसका वर्तमान जीवन व आगामी जन्म निर्मित होता है। इन सौ कर्मों में से 94 कर्म मनुष्य के अपने हाथ में होते हैं। वह उन्हें अपने विवेक, आचरण, भावना और प्रयास से करता है। लेकिन 6 कर्म ऐसे होते हैं, जो मनुष्य के बस में नहीं, बल्कि स्वयं विधि या ब्रह्मा के हाथ में माने जाते हैं।
ये छह कर्म हैं —
हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश।
इनका नियंत्रण मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति, भाग्य या ईश्वर के हाथ में होता है।
जब किसी व्यक्ति का देहांत होता है और उसका दाह संस्कार मणिकर्णिका घाट पर होता है, तब यह माना जाता है कि उसके जीवन के 94 कर्म उसी चिता की अग्नि के साथ भस्म हो जाते हैं। इसलिए चिता की राख पर 100 में से वे 94 कर्म लिखे जाते हैं, जो अब समाप्त हो चुके हैं। बच जाते हैं केवल 6 कर्म — जो उसके अगले जीवन, आने वाली परिस्थितियों और पुनर्जन्म की दिशा को तय करते हैं।
इस प्रकार 100 में से 6 को घटाने पर प्राप्त संख्या 94 ही चिता भस्म पर लिखी जाती है—
100 – 6 = 94
गीता का संदर्भ और 6 कर्मों का रहस्य
भगवद्गीता में कहा गया है कि मृत्यु के बाद मनुष्य का मन और पांच ज्ञानेन्द्रियां उसके साथ जाती हैं। ये कुल मिलाकर छह माने जाते हैं। इन छह के आधार पर ही आत्मा अगले जन्म का स्वरूप ग्रहण करती है। आगे किस देश में, किस कुल में, किन लोगों के बीच और किस परिस्थिति में जन्म होगा — यह प्रकृति और ईश्वर की योजना में निहित रहता है।
इसलिए घाट पर भस्म पर 94 अंक लिखने का भाव यही होता है —
“विदा यात्री, तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गए। अब शेष 6 कर्म तुम्हें अगले जीवन की ओर ले चलेंगे।”
अब पढ़िए वे 100 शुभ कर्म, जो जीवन को धर्म, नैतिकता और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं
इन कर्मों की सूची मनुष्य को जीवन की सार्थकता की प्रेरणा देती है। यहाँ हर एक कर्म को उसी क्रम में शामिल किया गया है, जैसा मूल रूप में बताया गया है — बिना किसी कटौती के:
✅ धर्म और नैतिकता के कर्म
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सत्य बोलना
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अहिंसा का पालन
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चोरी न करना
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लोभ से बचना
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क्रोध पर नियंत्रण
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क्षमा करना
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दया भाव रखना
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दूसरों की सहायता करना
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दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
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गुरु की सेवा
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माता-पिता का सम्मान
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अतिथि सत्कार
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धर्मग्रंथों का अध्ययन
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वेदों और शास्त्रों का पाठ
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तीर्थ यात्रा करना
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यज्ञ और हवन करना
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मंदिर में पूजा-अर्चना
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पवित्र नदियों में स्नान
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संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
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नियमित ध्यान और योग
✅ सामाजिक और पारिवारिक कर्म
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परिवार का पालन-पोषण
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बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
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गरीबों को भोजन देना
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रोगियों की सेवा
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अनाथों की सहायता
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वृद्धों का सम्मान
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समाज में शांति स्थापना
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झूठे वाद-विवाद से बचना
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दूसरों की निंदा न करना
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सत्य और न्याय का समर्थन
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परोपकार करना
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सामाजिक कार्यों में भाग लेना
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पर्यावरण की रक्षा
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वृक्षारोपण करना
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जल संरक्षण
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पशु-पक्षियों की रक्षा
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सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
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दूसरों को प्रेरित करना
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समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
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धर्म के प्रचार में सहयोग
✅ आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म
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नियमित जप करना
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भगवान का स्मरण
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प्राणायाम करना
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आत्मचिंतन
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मन की शुद्धि
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इंद्रियों पर नियंत्रण
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लालच से मुक्ति
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मोह-माया से दूरी
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सादा जीवन जीना
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स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
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संतों का सान्निध्य
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सत्संग में भाग लेना
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भक्ति में लीन होना
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कर्मफल भगवान को समर्पित करना
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तृष्णा का त्याग
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ईर्ष्या से बचना
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शांति का प्रसार
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आत्मविश्वास बनाए रखना
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दूसरों के प्रति उदारता
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सकारात्मक सोच रखना
✅ सेवा और दान के कर्म
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भूखों को भोजन देना
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नग्न को वस्त्र देना
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बेघर को आश्रय देना
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शिक्षा के लिए दान
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चिकित्सा के लिए सहायता
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धार्मिक स्थानों का निर्माण
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गौ सेवा
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पशुओं को चारा देना
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जलाशयों की सफाई
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रास्तों का निर्माण
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यात्री निवास बनवाना
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स्कूलों को सहायता
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पुस्तकालय स्थापना
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धार्मिक उत्सवों में सहयोग
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गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
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वस्त्र दान
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औषधि दान
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विद्या दान
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कन्या दान
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भूमि दान
✅ नैतिक और मानवीय कर्म
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विश्वासघात न करना
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वचन का पालन
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कर्तव्यनिष्ठा
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समय की प्रतिबद्धता
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धैर्य रखना
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दूसरों की भावनाओं का सम्मान
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सत्य के लिए संघर्ष
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अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
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दुखियों के आँसू पोंछना
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बच्चों को नैतिक शिक्षा
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प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
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दूसरों को प्रोत्साहन
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मन, वचन, कर्म से शुद्धता
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जीवन में संतुलन बनाए रखना
✅ अब वे 6 कर्म, जो मनुष्य के हाथ में नहीं
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हानि
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लाभ
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जीवन
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मरण
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यश
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अपयश
सार: 94 भस्म हुए, 6 साथ चलते हैं
1 से 94 तक के सभी कर्म मनुष्य की इच्छा, प्रयास और चेतना से जुड़े हैं। लेकिन अंतिम छह कर्म — हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, और अपयश — मनुष्य के वश से बाहर होते हैं और इन्हें विधि, प्रकृति या ईश्वर की इच्छा माना जाता है।
इसी आध्यात्मिक भाव के साथ मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख पर 94 लिखा जाता है। यह केवल अंक नहीं बल्कि जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के सनातन चक्र की मौन घोषणा है।
“विदा यात्री, तुम्हारे 94 कर्म भस्म हुए… तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।”

