विधायक पुत्र पर हमले की कहानी का हुआ पर्दाफाश,सीसीटीवी और कॉल डिटेल्स ने खोली परतें
उत्तराखण्ड सत्य, रूद्रपुर
राजनीति और व्यक्तिगत जीवन के द्वंद्व में जब सत्य की बलि चढ़ाई जाती है, तो उसके परिणाम अक्सर आत्मघाती होते हैं। किच्छा के कद्दावर कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ के पुत्र और नगर निगम पार्षद सौरभ राज बेहड़ पर हुए कथित जानलेवा हमले का जो पर्दाफाश उधम सिंह नगर पुलिस ने किया है, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम सनसनीखेज नहीं है। जिस घटना ने जिले की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे और राजनैतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था, उसकी गहराई में जाने पर एक ऐसा सच सामने आया जिसने न केवल पुलिस प्रशासन को चकित कर दिया, बल्कि एक पिता के रूप में तिलक राज बेहड़ के गौरव को भी गहरी ठेस पहुँचाई। पुलिस की वैज्ञानिक जांच और तकनीकी साक्ष्यों ने यह प्रमाणित कर दिया कि यह हमला बाहरी दुश्मनी का नतीजा नहीं, बल्कि स्वयं के द्वारा रचा गया एक सुनियोजित ड्रामा था। इस पूरे मामले की तफ्तीश रुद्रपुर पुलिस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। बीती 18 जनवरी की शाम जब सौरभ राज बेहड़ घायल अवस्था में अस्पताल पहुंचे, तो पूरे जनपद में तनाव फैल गया। विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया और पुलिस पर आरोपियों की गिरफ्तारी का भारी दबाव था। एसएसपी मणिकांत मिश्रा ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कई टीमों का गठन किया, जिन्होंने शहर के चप्पे-चप्पे को खंगालना शुरू किया। पुलिस ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए रुद्रपुर शहर के लगभग तीन सौ से अधिक सीसीटीवी कैमरों की फुटेज का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। जांच में यह बात सामने आई कि हमलावर बेहद शातिर थे और वे बार-बार मुख्य मार्गों को छोड़कर आवास विकास और ट्रांजिट कैंप की उन तंग गलियों का सहारा ले रहे थे जहाँ कैमरों की नजर से बचा जा सके। लेकिन पुलिस की तकनीकी विंग ने हजारों मोबाइल नंबरों के डेटा और टावर लोकेशन्स का ऐसा जाल बुना कि षडयंत्र की परतें एक-एक कर खुलने लगीं। पुलिस की गिरफ्त में आए मुख्य आरोपी इंदर नारंग ने जब राज उगलना शुरू किया, तो मामले ने यू-टर्न ले लिया। पूछताछ में यह तथ्य उजागर हुआ कि पार्षद सौरभ राज बेहड़ अपनी पत्नी के साथ चल रहे पारिवारिक विवाद के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव में थे। उन्होंने समाज और परिवार की सहानुभूति बटोरने के लिए एक खतरनाक रास्ता चुना। 18 जनवरी को सौरभ ने खुद ही अपने दोस्त को बुलाया और उन्हें हमले की पूरी स्क्रिप्ट समझाई। योजना के अनुसार, उन्हें स्कूटी से एक निश्चित स्थान पर पहुंचना था जहाँ पहले से मौजूद नकाबपोशों को उन पर हमला करना था। सख्त निर्देश थे कि चोट केवल शरीर पर दिखाई देनी चाहिए, जान का कोई खतरा नहीं होना चाहिए। पुलिस ने जब सौरभ के कॉल रिकॉर्ड्स और इंदर नारंग के साथ उनके संवादों को डिकोड किया, तो यह स्पष्ट हो गया कि जिसे दुनिया जानलेवा हमला समझ रही थी, वह दरअसल सहानुभूति पाने की एक आत्मघाती चाल थी। इस खुलासे के बाद विधायक तिलक राज बेहड़ ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से अपने पुत्र की गलती को स्वीकार किया, उसने राजनीति में शुचिता की एक नई मिसाल पेश की, हालांकि एक पिता की आंखों के आंसू उस गहरी पीड़ा को बयां कर रहे थे जो इस धोखे ने उन्हें दी थी।
डिजिटल साक्ष्यों का चक्रव्यूह और बिखरते झूठ के तिलिस्म
रुद्रपुर। पुलिस द्वारा इस केस का खुलासा आधुनिक अपराध विज्ञान और तकनीकी सर्विलांस की एक बेमिसाल मिसाल है। जब अपराधी नकाबपोश हों और वारदात की कोई स्पष्ट गवाह न हो, तब केवल ‘डिजिटल फुटप्रिंट्स’ ही सत्य तक पहुँचाने का जरिया बनते हैं। पुलिस की साइबर और सर्विलांस सेल ने जिस धैर्य के साथ सैकड़ों मोबाइल कॉल्स का विश्लेषण किया, वह इस मामले का सबसे मजबूत स्तंभ साबित हुआ। जांच अधिकारियों ने पाया कि वारदात से ठीक पहले और बाद में कुछ खास नंबरों की सक्रियता आवास विकास की उन संकरी गलियों में देखी गई, जहाँ से हमलावर फरार हुए थे। सीसीटीवी फुटेज में हमलावरों का गलियों में बार-बार चक्कर काटना और पुलिस को गुमराह करने के लिए रास्तों को बदलना यह स्पष्ट कर रहा था कि उन्हें स्थानीय भूगोल की पूरी जानकारी थी। सबसे बड़ा तकनीकी साक्ष्य इंदर नारंग और विधायक पुत्र के बीच हुए संवादों का वह डिजिटल रिकॉर्ड था, जिसे मिटाने की कोशिश तो की गई लेकिन पुलिस के फॉरेंसिक टूल्स ने उसे रिकवर कर लिया। यह केस स्टडी बताती है कि आज के दौर में कोई भी अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, वह सूचना प्रौद्योगिकी के युग में अपनी उपस्थिति के निशान पीछे छोड़ ही देता है। पुलिस ने जिस तरह से सीसीटीवी कैमरों की कड़ियों को जोड़कर एक वर्चुअल मैप तैयार किया, उसने आरोपियों के भागने के रास्ते को पूरी तरह डिकोड कर दिया। एसएसपी मणिकांत मिश्रा द्वारा पार्षद की सुरक्षा में तैनात गनर को वापस बुलाना और निष्पक्ष कार्रवाई का आदेश देना यह संदेश देता है कि कानून की नजर में पद और प्रतिष्ठा से ऊपर सत्य और न्याय की महत्ता है। यह मामला भविष्य में पुलिस ट्रेनिंग के लिए एक संदर्भ बनेगा कि कैसे राजनैतिक दबाव के बावजूद वैज्ञानिक पद्धति से किसी भी हाई-प्रोफाइल साजिश का पर्दाफाश किया जा सकता है।

