उत्तराखण्ड सत्य,देहरादून
प्रदेश नेतृत्व में बदलाव के साथ ही उत्तराखंड कांग्रेस ने अपने जिले और शहर संगठन को भी नए सिरे से खड़ा कर दिया है। गणेश गोदियाल की दूसरी पारी की शुरुआत के साथ पार्टी ने देहरादून को छोड़कर पूरे प्रदेश में 12 जिलों और प्रमुख नगरों- महानगरों को मिलाकर कुल 27 नए पदाधिकारियों की घोषणा की है। यह फेरबदल सिर्फ नामों का नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक महीनों में कांग्रेस की नई रणनीतिक दिशा का संकेत भी है। अल्मोड़ा में भूपेंद्र सिंह भोज को नई जिम्मेदारी दी गई है, जबकि बागेश्वर में अब अर्जुन चंद्र भट्ट जिला कांग्रेस अध्यक्ष होंगे। चमोली में सुरेश डिमरी को कमान सौंपी गई है, जिनका परिवार लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावशाली रहा है। चंपावत में चिराग सिंह फर्त्याल, हरिद्वार जिले में बालेश्वर सिंह और नैनीताल में राहुल छिमवाल अब जिला अध्यक्ष की भूमिका निभाएंगे। प्रदेश के वीवीआईपी जिले पौड़ी गढ़वाल में कांग्रेस ने विनोद सिंह नेगी पर भरोसा जताया है। पिथौरागढ़ की बागडोर मुकेश पंत के हाथों दी गई है, जबकि रुद्रप्रयाग में अब कुलदीप कंडारी संगठन को नई दिशा देंगे। टिहरी गढ़वाल में मुराली लाल खंडवाल और उत्तरकाशी में प्रदीप सिंह रावत को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। उधम सिंह नगर जिले में हिमांशु गाबा को पुनः कमान सौंपी गयी है। शहरी इकाइयों में भी बदलाव व्यापक हैं। देवप्रयाग के लिए उत्तम असवाल को चुना गया है। राजधानी क्षेत्र में देहरादून महानगर की कमान जसविंदर सिंह गोगी को सौंपी गई है, जबकि पछवादून में संजय किशोर और परवादून में मोहित उनियाल नए अध्यक्ष होंगे। कुमाऊं में हल्द्वानी शहर की जिम्मेदारी गोविंद सिंह बिष्ट को दी गई है। काशीपुर शहर की नई अध्यक्ष अलका पाल होंगी और रुद्रपुर महानगर में कांग्रेस ने ममता रानी को प्रमुख बनाया है। डीडीहाट शहर में मनोहर सिंह टोलिया और हरिद्वार महानगर में अमन गर्ग का चयन नई पीढ़ी के राजनीतिक नेतृत्व का संकेत देता है। कोटद्वार क्षेत्र में भी दो महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ हुई हैं-विकास नेगी को जिला कांग्रेस अध्यक्ष और मीना देवी को कोटद्वार शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है। दोनों पर आगामी चुनावी दौर में गढ़वाल की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की जिम्मेदारी होगी। यह पूरा पुनर्गठन बताता है कि कांग्रेस उत्तराखंड में अपने संगठन को सक्रिय, ऊर्जावान और स्थानीय स्तर पर अधिक मजबूत बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। 27 नए पदाधिकारियों की यह टीम आगामी चुनावी परिदृश्य में पार्टी की रणनीतिक ताकत को परखने के साथ-साथ प्रदेश राजनीति में कांग्रेस की नई शुरुआत का आधार भी बनेगी।
नई नियुक्ति से कांग्रेस में बगावत का भूचाल
रुद्रपुर। प्रदेश की राजनीति में इस समय दो बिल्कुल विपरीत तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। एक ओर भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। बूथ से लेकर मंडल और जिला स्तर तक कार्यक्रमों की श्रृंखला चल रही है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक संगठन को जनता से जोड़ने और चुनावी तैयारियों को गति देने में लगातार जुटा है। भाजपा के कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं की सक्रियता और संगठन की अनुशासनात्मक पकड़ साफ नजर आ रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस पूरी तरह से आंतरिक कलह में घिरी दिख रही है। जिला और महानगर कमेटियों की नई घोषणा के साथ ही रुद्रपुर में गुटबाजी खुलेआम फूट पड़ी है। पूर्व कैबिनेट मंत्री तिलकराज बेहड़ के पुत्र सौरभ बेहड़ सहित 12 कांग्रेस पार्षदों का एक साथ इस्तीफा देना न केवल स्थानीय संगठन बल्कि पूरे प्रदेश कांग्रेस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रायशुमारी के नाम पर कार्यकर्ताओं की राय लेने का दिखावा और फिर उसके बिल्कुल विपरीत जिलाध्यक्ष की नियुक्ति ने पार्टी नेतृत्व पर भरोसे को चोट पहुंचाई है। सौरभ बेहड़ और अन्य पार्षदों के मुताबिक, रायशुमारी की प्रक्रिया केवल नाटक बनकर रह गई। युवाओं और कार्यकर्ताओं की राय को दरकिनार कर मनोनयन के आधार पर फैसले लेने की प्रवृत्ति कांग्रेस को एक बार फिर गुटबाजी के दलदल में धकेल रही है। हालात इतने बिगड़े कि पार्षदों ने प्रेस कॉन्फ्ेंस में सीधे प्रदेश नेतृत्व पर प्रश्न उठाते हुए प्राथमिक सदस्यता तक छोड़ दी। किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ भी जिलाध्यक्ष हिमांशु गाबा की नियुक्ति पर खुलकर नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने सवाल खड़े किए कि आिखर जिस व्यक्ति की कोई ठोस संगठनात्मक उपलब्धि सामने नहीं, उसे महत्वपूर्ण पद क्यों दिया गया? यहां तक कि गाबा पर भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को समर्थन देने जैसे आरोप भी लगाए गए। दूसरी ओर गाबा ने बेहड़ पर ‘अपनी चलाने’ का आरोप लगाते हुए कहा कि जिला संगठन में विरोध केवल रुद्रपुर में ही क्यों हो रहा है, यह खुद बहुत कुछ बता देता है। इन आरोप-प्रत्यारोपों से साफ है कि कांग्रेस गुटबाजी के पुराने रोग से अभी भी उबर नहीं पा रही। शीर्ष नेतृत्व बार-बार एकजुटता की अपील करता है, लेकिन जमीन पर हालात उलटे हैं-कार्यकर्ता असंतुष्ट, पार्षद इस्तीफा दे रहे, और वरिष्ठ नेता एक-दूसरे पर उंगलियां उठा रहे हैं। जबकि भाजपा लगातार बूथों को मजबूत कर रही, प्रदेशभर में जनसंपर्क अभियान चला रही और संगठन के हर स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर रही है, कांग्रेस की प्राथमिक लड़ाई अपने ही घर को संभालने की बन गई है। चुनावी गणित बताता है कि गुटबाजी और असंतोष से घिरी पार्टी न तो जनता के बीच विश्वास पैदा कर पाती है और न ही राजनीतिक मुकाबले में मजबूती से उभर पाती है। रुद्रपुर में 12 पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं। यह मिशन 2027 से पहले कांग्रेस संगठन की वास्तविक स्थिति का आईना है।

