पच्चीस वर्षों की राजनीतिक अस्थिरता के बीच भी विकास ने बनाई अपनी राह
अजय चड्डा,रूद्रपुर
उत्तराखंड 9 नवंबर 2025 को अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर 26वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस जनआंदोलन की परिणति का प्रतीक है, जिसने पहाड़ों की अस्मिता, विकास और पहचान के लिए 90 के दशक में चिंगारी जलाई थी। रजत जयंती वर्ष में प्रवेश करता उत्तराखंड आज अपने अब तक के सफर पर पीछे मुड़कर देख रहा है कृ जहाँ एक ओर राजनीतिक अस्थिरता और नेतृत्व परिवर्तन की छाया रही, वहीं दूसरी ओर विकास, प्राकृतिक संपदाओं के संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। राज्य गठन के बाद की यात्र अगर राजनीतिक दृष्टि से उथल-पुथल भरी रही है, तो सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तनकारी भी रही है। उत्तराखंड ने अपनी भौगोलिक जटिलताओं, सीमित संसाधनों और पर्वतीय चुनौतियों के बावजूद विकास की नई मिसालें कायम की हैं। उत्तराखंड की राजनीति शुरू से ही अस्थिरताओं से घिरी रही है। 25 वर्षों में प्रदेश ने 11 मुख्यमंत्रियों को बदलते देखा। अंतरिम सरकार में नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री बने, पर एक साल भी नहीं टिक पाए। भगत सिंह कोश्यारी ने कार्यभार संभाला, लेकिन स्थायित्व तब भी नहीं मिला। राज्य गठन के दो वर्ष बाद जब 2002 में पहले विधानसभा चुनाव हुए, तो कांग्रेस सत्ता में आई और एन-डी- तिवारी ने प्रदेश को पहली स्थिर सरकार दी। तिवारी अब तक के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपना पूर्ण कार्यकाल पूरा किया। उनके शासनकाल में औद्योगिक विकास की नींव रखी गई । पंतनगर औद्योगिक क्षेत्र को गति मिली, सड़कों का जाल बिछा और राज्य में निवेश का माहौल बना। 2007 में सत्ता बीजेपी के हाथ आई, पर राजनीतिक मतभेदों के चलते भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक और फिर दोबारा खंडूड़ी कृ तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े। 2012 में कांग्रेस लौटी और विजय बहुगुणा से लेकर हरीश रावत तक दो मुख्यमंत्री बने। इस दौरान केदारनाथ आपदा ने राज्य की नीतियों और प्राथमिकताओं को बदल दिया। आपदा प्रबंधन, राहत कार्यों और पुनर्निर्माण की दिशा में राज्य ने सीख ली और बाद में फ्आपदा के साथ जीने की संस्कृतिय् विकसित की। 2017 के बाद बीजेपी ने फिर सत्ता संभाली और पांच साल के भीतर तीन मुख्यमंत्री बदले त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी। हालांकि नेतृत्व परिवर्तन बार-बार हुआ, लेकिन विकास की गति थमी नहीं। धामी के नेतृत्व में प्रदेश ने निवेश, पर्यटन और डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में कदम बढ़ाए। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती थी -बुनियादी ढांचा, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को सुदूर पहाड़ों तक पहुँचाना। 25 साल बाद तस्वीर काफी बदली है। आज चारधाम ऑल वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, देहरादून और पंतनगर हवाई अîóों का विस्तार, और ग्रामीण सड़कों का सुदृढ़ नेटवर्क राज्य के बदलते स्वरूप की गवाही दे रहा है। पर्यटन के क्षेत्र में उत्तराखंड ने अभूतपूर्व प्रगति की है। योग, अध्यात्म, एडवेंचर टूरिज्म और इको टूरिज्म के केंद्र के रूप में राज्य की पहचान बनी। ऋषिकेश का इंटरनेशनल योग फेस्टिवल, चारधाम यात्र, फूलों की घाटी, औली और नैनीताल जैसे स्थलों ने वैश्विक पहचान बनाई। औद्योगिक विकास की दृष्टि से भी राज्य ने मजबूत कदम बढ़ाए। पंतनगर, सिडकुल और हरिद्वार औद्योगिक क्षेत्रें में निवेश बढ़ा। ऑटोमोबाइल, फार्मा और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रें में उत्तराखंड राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। गठन के समय शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित थीं। आज राज्य में उच्च शिक्षा संस्थानों का मजबूत नेटवर्क है -आईआईटी रुड़की, एम्स ऋषिकेश, राज्य कृषि विश्व विद्यालय, और आयुर्वेद विश्वविद्यालय जैसे संस्थान उत्तराखंड को शिक्षा एवं चिकित्सा का हब बना रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में टेलीमेडिसिन और मोबाइल हेल्थ यूनिट्स की शुरुआत ने पहाड़ों में स्वास्थ्य पहुँच को नया आयाम दिया है। उत्तराखंड में महिला शक्ति सदैव आंदोलनों और समाज निर्माण की धुरी रही है। राज्य बनने के बाद महिला स्वयं सहायता समूहों, पल्लवित फ्महिला मंगल दलोंय् और ग्राम्य विकास कार्यक्रमों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दी। जल संरक्षण, वनों की सुरक्षा और हस्तशिल्प के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी से पहाड़ों की अर्थव्यवस्था को सहारा मिला। राज्य ने आपदाओं से लड़ते हुए लचीलापन विकसित किया है। केदारनाथ आपदा के बाद पर्वतीय निर्माण नीति, नदी तंत्र के संरक्षण, और आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुए। ग्लेशियरों के पिघलने और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद राज्य ने पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की कोशिश जारी रखी है। उत्तराखंड आज अपनी रजत जयंती पर सिर्फ अतीत का लेखा-जोखा नहीं कर रहा, बल्कि फ्विकसित उत्तराखंड /2047य् का सपना लेकर आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगुवाई में राज्य फ्सरल शासन-सशक्त नागरिकय् की दिशा में काम कर रहा है। डिजिटल प्रशासन, निवेश मित्र नीति, युवाओं के लिए स्वरोजगार कार्यक्रम और पर्यटन को वर्षभर का रोजगार स्रोत बनाने की योजनाएँ इस नई दृष्टि की झलक हैं। 25 सालों के सफर ने उत्तराखंड को सिखाया है कि स्थायित्व केवल सत्ता का नहीं, बल्कि विकास के संकल्प का होना चाहिए। यह राज्य बार-बार बदले नेतृत्व के बावजूद आगे बढ़ता रहा – संघर्षों के बीच संकल्प और उम्मीद की यह कहानी ही उत्तराखंड की असली पहचान है।
वो सपने जो पहाड़ों ने देखे अब सच बन रहे हैं
देहरादून। उत्त्तराखण्ड राज्य के पच्चीस साल बाद आज कुछ सपने सच हुए हैं तो कई सपने आज भी पूरे नहीं हो पाये हैं। उत्तराखंड की 25 साल की यात्रा सिर्फ सरकारों और मुख्यमंत्रियों की गिनती नहीं, बल्कि उन लाखों आम लोगों की कहानी है जिनकी जिंदगी में धीरे-धीरे बदलाव आया। हालाकि पलायन आज भी पहाड़ की बड़ी समसया है लेकिन कई गांवों में युवा लौटकर अपने पहाड़ में ही स्वरोजगार के रास्ते खोज रहे हैं ।कोई ऑर्गेनिक खेती कर रहा है, कोई होमस्टे चला रहा है, तो कोई डिजिटल सर्विस सेंटर से रोजगार कमा रहा है। महिला स्वयं सहायता समूहों ने पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। नैनीताल से लेकर पिथौरागढ़ तक महिलाएँ अब सिर्फ घर तक सीमित नहीं, बल्कि हस्तशिल्प, दूध उत्पादन और पर्यटन व्यवसाय में अहम भूमिका निभा रही हैं। पर्यटन ने भी लोगों के जीवन को छुआ है चारधाम यात्रा, योग और वेलनेस पर्यटन के साथ अब फ्ग्रामीण टूरिज्मय् की नई धारणा विकसित हुई है। गाँवों में होमस्टे योजनाएँ न सिर्फ रोजगार दे रही हैं, बल्कि लोगों को अपने संस्कृति और पहाड़ की जड़ों से जोड़ रही हैं। रजत जयंती वर्ष में जब उत्तराखंड पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे यह एहसास होता है कि विकास सिर्फ नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि आम लोगों की धैर्य, उम्मीद और सहयोग की कहानी भी है। संघर्ष अब भी हैं, चुनौतियाँ बाकी हैं पर पहाड़ की नब्ज अब आत्मविश्वास से धड़क रही है।

